भाई वाजिद अली शाह के जमाने के एक शायर ' चिरकिन ' का नाम सुना था .कहते हैं वो सिर्फ गू मूत आदि त्याज्य चीजों पे कहते थे .सूनी हुयी उनकी एक बानगी ............. ' चिरकिन ' चने के खेत में चिरको सरक सरक . रंगत अलग अलग हो ,खुशबू ( बदबू ? ) अलग अलग ...
Thursday, 4 July 2013
मैंने खाई बाँसी रोटी
मैंने खाई बाँसी रोटी
और पीया
लहसुन-काले नमक वाला मट्ठा
मारा ऐसा पाद
पूरा class रह गया हक्का-बक्का ...
हवाओं में मूली के परांठे लहरा रहे है
रसोई में बावर्ची नहीं
पैखाने में बाबूजी ही जोर लगा रहे है ...
और पीया
लहसुन-काले नमक वाला मट्ठा
मारा ऐसा पाद
पूरा class रह गया हक्का-बक्का ...
हवाओं में मूली के परांठे लहरा रहे है
रसोई में बावर्ची नहीं
पैखाने में बाबूजी ही जोर लगा रहे है ...
Wednesday, 3 July 2013
अब न दे मेरे पीने पे ताने ...
अब न दे मेरे पीने पे ताने
होश में अपने लगने लगे है बेगाने
तेरी मर्जी तू चाहे माने या न माने
हम तो मैकदे जाते है
सिर्फ गैरों से मुहब्बत पाने ...
होश में अपने लगने लगे है बेगाने
तेरी मर्जी तू चाहे माने या न माने
हम तो मैकदे जाते है
सिर्फ गैरों से मुहब्बत पाने ...
वो संडास को बार-बार ...
वो संडास को बार-बार
गुलज़ार करते है
ठेले की पानी पूरी
खाने की सज़ा
किस्तों में अदा करते है ...
Tuesday, 2 July 2013
TV channels में खबर खोजता हूँ
तमाम खबर के लिए बने
TV channels में खबर खोजता हूँ
पर महसूस होता है की
भूसे के ढेर सुई ढूंढता हूँ ...
क्या मैं छुट्टे सांड से
दूध की उम्मीद रखता हूँ ??
TV channels में खबर खोजता हूँ
पर महसूस होता है की
भूसे के ढेर सुई ढूंढता हूँ ...
क्या मैं छुट्टे सांड से
दूध की उम्मीद रखता हूँ ??
Monday, 1 July 2013
रविश-ए-गुल[1] है कहां यार हंसाने वाले
हमको शबनम [2] की तरह सब है रूलाने वाले
सोजिशे-दिल[3] का नहीं अश्क बुझाने वाले
बल्कि हैं और भी यह आग लगाने वाले
मुंह पे सब जर्दी-ए-रूखसार[4] कहे देती है
क्या करें राज मुहब्बत के छिपाने वाले
देखिए दाग जिगर पर हों हमारे कितने
वह तो इक गुल हैं नया रोज खिलाने वाले
दिल को करते है बुतां[5], थोड़े से मतलब पे खराब
ईंट के वास्ते, मस्जिद हैं ये ढाने वाले
नाले हर शब को जगाते हैं ये हमसायों को
बख्त-ख्वाबीदा[6] को हों काश, जगाने वाले
खत मेरा पढ़ के जो करता है वो पुर्जे-पुर्जे
ऐ ‘जफर’, कुछ तो पढ़ाते हैं पढ़ाने वाले
हमको शबनम [2] की तरह सब है रूलाने वाले
सोजिशे-दिल[3] का नहीं अश्क बुझाने वाले
बल्कि हैं और भी यह आग लगाने वाले
मुंह पे सब जर्दी-ए-रूखसार[4] कहे देती है
क्या करें राज मुहब्बत के छिपाने वाले
देखिए दाग जिगर पर हों हमारे कितने
वह तो इक गुल हैं नया रोज खिलाने वाले
दिल को करते है बुतां[5], थोड़े से मतलब पे खराब
ईंट के वास्ते, मस्जिद हैं ये ढाने वाले
नाले हर शब को जगाते हैं ये हमसायों को
बख्त-ख्वाबीदा[6] को हों काश, जगाने वाले
खत मेरा पढ़ के जो करता है वो पुर्जे-पुर्जे
ऐ ‘जफर’, कुछ तो पढ़ाते हैं पढ़ाने वाले
शब्दार्थ:
Subscribe to:
Posts (Atom)