Thursday, 8 August 2013

अजी तुमने
क्या पी शराब ??
कब कहाँ
मचाया बवाल ?

भसड फैलाई ?
ग़दर मचाई ?
अंग्रेजी सुनाई ?
बोतल ख़त्म करने की
शर्त लगाई ??

क्या कभी
ऐसे कदम लड़खड़ाये ?
शाम के घुसे
यारो पर  लदे
सुबह को ही
मैकदे से घर को आये …

क्या कभी जोर से चिल्लाये
अपनी न हुई
माशूका के नाम के
नारे लगाये ???

किसी  को गरियाये ??
बापू द्वारा  पकडे जाने पर लजाये ?
hostel के कमरे में
खाली बोतलों को सजाये ??

कभी रात भर
पलटियां  मारी ??
सुबह hangover ने
किया सिर को  भारी ??
निम्बू पानी से नहीं
एक और छोटा ले
दूर की अपनी
ये आफत सारी  ??

विलायती छोड़
देशी को सुख लूटा
पहली धार के ठर्रे ने
स्कॉच को भी
क्या कभी किया फीका ??

अगर नहीं तो फिर
तुमने क्या पी शराब ??
कब कहाँ
मचाया  बवाल ?








Wednesday, 7 August 2013

उनकी गुस्ताखियाँ
किस कदर परवान चढ़ती है
हर रोज ही 
हम सबको  हैरान करती है 

अपने कहे से 
उनको कब कहाँ गुरेज ???
उनकी जुबां तो हमेशा 
खंजर का ही काम करती है 

पाले है कनेर के शजर  
हमने   आंगन में अपने 
अब उनसे  मीठे फल की चाहत 
हमको  ही बदनाम करती है 

धुँआ  घर की चौके से नहीं उठता मेरे 
हर रोज की फाकाकशी ही 
अपनी ज़िन्दगी बयां करती  है 

खुदगर्ज सियासत चिपकी  
जोंक सी मुल्क को मेरे 
रफ्ता-रफ्ता  हमारा  ही 
कत्लेआम करती है 






अपनी फाकाकशी में
उनसे आशिकी कर बैठे 
अंजाम की परवाह बिना 
हाय ये क्या गजब कर बैठे

जाल उनकी मस्त निगाहों ने फेका 
और  हम अपनी औकात भूल बैठे 
अपना ये मरदूद, मुफलिस दिल 
हाय क्यों बिन सोचे ही  दे बैठे 

शौक बहुत महंगे है उनके 
हम कंगाली में आटा गीला  कर बैठे 
अपने ही  हाथो से 
हाय अपनी ही जेबतराशी कर बैठे 

 








Tuesday, 6 August 2013

हमारे इस दिमाग में
तरह-तरह के
ख्यालो  का  डेरा है

अपनी पेट भरने की
चिंता सबसे पहले
देश पीछे कहीं
छूटा अकेला है

मरता है तो मरे
सरहद पे सैनिक
उसकी सुध कौन लेता है ???

स्वार्थ से
लहू श्वेत हो गया हमारा
जमा रहता
अब धमनियों में कहाँ बहता है ??

बेफ़जूल है
अब वतन परस्ती की बाते
इनसे हांसिल क्या होता है ???

ढूंढे से नहीं मिलता
नई नस्ल को
सच्चा रहनुमा कोई
अपना मुल्क अब
कितनी किल्लत में जीता है
















भरे दिन में 
कभी इतना अँधेरा न था 
जलालत बढ़ती गई  
और हुकूमत  सोती रही 

Saturday, 3 August 2013

इस जीवन में
बस इतना ही कमा पाया हूँ
कुछ सच्चे दोस्त बना पाया हूँ

बहुत खुशकिस्मत हूँ
जो मिले है यार ऐसे
खुद से ज्यादा भरोसा
जिन पे कर पाया हूँ …













Friday, 2 August 2013

अपने आप में सिमटते जाते है 
कितने तंग हम नज़र आते है 

हिमाकत खुद की है 
तो शिकायत किस से करे ?
रोज खुद की  नज़रो में 
खुद को ही मुजरिम पाते है