Tuesday, 19 May 2015

जेठ की  इस भरी दोपहरी खाना खाकर सब सुस्ता रहें है , माँ की जबरदस्त हिदायत भरी चेतावनी  है -- बाहर लू चल रही है , खबरदार अगर घर के बाहर पैर भी रखा तो , तू  सोयगा तो है नहीं और  कुछ न कुछ खुराफ़ात तो जरुर करेगा ही पर ध्यान रहे  कि  कोई भी खटर-पटर न हो , अगर तेरे मचाये शोर से तेरे पापा जग गए तो मै तुझे बचाने नहीं आऊँगी ...

माँ इतना कुछ कह अन्दर के कमरे में सोने चली गयी ... उसकी रोज की व्यस्त दिनचर्या में सुस्ताने का ये ही तो अल्प समय है , इस मध्यमवर्गी परिवार में एक  वो ही शेषनाग है जिसने सम्पूर्ण गृहस्थी का बोझ संभल रखा है ... पिताजी का काम पैसे कमाने और बाहर के छोटे-मोटे कामो का अलावा ज्यादा कुछ और नहीं और  घर के सारे कामो की जिम्मेदारी तो इसी के कंधो पे है ... मेहरी , धोबी , और माली की शाही  सुविधा इस बचतोन्मुख परिवार में कहाँ ?

सुबह जल्द उठ के पानी भरना , सम्पूर्ण घर की झाड़ू बुहारी और पोछा, नहा-धोकर मंदिर में दीया जलाना , दूध वाले से दूध लेना और उससे दूध के पतला होने की झिक-झिक करना , सबके लिए चाय बनाना और उसे उनके बिस्तर तक पहुचना , घर के अपने छोटे से खेत के गुड़ाई करना ,पौंधो में पानी डालना , सबके लिए नाश्ता बनाना और उसके उसके उपरांत लगे बर्तनों के अम्बार को अपने हाथो के करतब से चमकाना और इस बीच दरवाजे पे कोई मांगने वाला आ जाय तो उसे कभी भी खाली हाथ न लौटने देना , मेतरानी की भी सुनना और उसे भी चाय पिलाना और  रोटी –सब्जी खिलाना ...

सुबह के काम से निबटना और दोपहर के में जुट जाना , ये वो समय है जब न तो रसोई गैस की सुविधा है और ना हीं पिसे मसालों का विलासी सुख  , केरोसिन स्टोव , बुरादे के अंगेठी और सिल -बट्टे  से ही जूझना है ,फूंकना है और काले हाथ ,ललाट लिए, पसीने से तरबतर हो बस जुटे ही रहना है  ...बचत के लिए थोडा अधिक शारीरिक श्रम कर लेना ही मानसिकता है और हो भी क्यों ना , वर्तमान के ये थोड़े-बहुत अतिरिक्त श्रम अतीत  के विकराल  अभावो  के सम्मुख  कितने बौने जो नज़र आते है...

खैर घर में सब सो चुके है , पिताजी के खर्राटे मुझे उनके  गहरी नींद में होने की अवस्था से   आश्वस्त करा रहे है , यही सही मौका घर से बाहर निकलने का , चप्पल पैरो से निकाल के हाथ में पकड़ ली है , मेन दरवाजे के कुंडी जो पिछली दफा मेरे पकडे जाने का कारण बनी थी उसे कल रात ही सिलाई मशीन के तेल से सराबोर कर शांत किया जा चुका है , घर के लोहे के  गेट को खोलने से उत्पन्न आवाज़ का जोखिम नहीं लिया जा सकता इसलिए दीवार फांदना ही उचित रहेगा और समस्त बाधाओं को पार कर मै घर के पास की इस पसंदीदा बगिया में पहुँच चुका हूँ जहाँ चारो ओर आम के पेड़ो की बहुतायत है , और ये क्या ? पिंकू , रिंकू , नन्हे , कल्लू और बबलू भी अपने घर वालों को धता दे बाग़ में पहुँच चुके है ...

ढेले ,पत्थर इक्कठे किये जा रहे है , स्पर्धा इस बात की है कौन सबसे पहले अमिया पेड़ से  झडाऐगा , कलमी और फजली अमियाँ के पेड़ चुना गया है , ये मीठी जो होती है और अगर कोयल पद्दो मिल जाये तो और भी सोने पे सुहागा  ...दे दना दन पत्थर और ढेले फेंके जा रहे है और उनके लक्ष्य से जरा से चूकने का अपनी वाणी और सिर को  पकड़ के एक  बड़ा सा अफ़सोस भी मनाया जा रहा है , अचानक लक्ष्य भेद ही लिया गया , तीन  अमिया नीचे गिर चुकी हैं  , सब उन्हें  लूटने को दौड़ पड़े है और इस बहस के बीच कि  किसका निशाना लगा और ये गिरे हुए  अपरिपक्व फल किसके  है ,  दूर माली की गाली भरी आवाज़ कानो में पड़ रही है ... अपने आपसी  विवाद को भुला  सब के सब गिरी हुई अमिया को  उठाके  भाग रहे है हमारे घर के बाहर के  बरांडे की ओर जहाँ बैठ ,  मिल बाँट  हम सब अपनी इस मेहनत का  स्वाद लेंगे...

अपने इस सम्मलित प्रयास का मजा लिया  जा रहा है , अमिया की चेपी अच्छी तरह से  निकल ली गयी है , अब उसको हाथ से फोड़ के सबमें बांटा जा रहा है , पत्थर फेकने के कारण अपने मैले-कुचले हाथो को अपनी कमीज से पोछ सभी बालक अपनी माँओ  का काम बडा,  ख़ुशी-ख़ुशी अपनी इस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं , धूप कम होने   होने का बेसब्री से इंतज़ार है , शाम को बच्चो के यही चौकड़ी पतंगबाज़ी में अपने हाथ आजमाएगी...

इस गर्मी में वातानुकूलित   मॉल्स से फल खरीदते अपने अभिभावकों के साथ बच्चो को देख बार-बार मन में यही ख्याल आता है कि हमारी उन्नति हमारी संतानों को प्रकृति से कितना दूर ले जा रही है, चका-चौंध और चमक वास्तविकता  पर कितनी  हावी  है ...
पिता –पुत्र का सम्बब्ध अनेकों उतार-चढाव  वाला होता है, जीवन की विभिन्न अवस्थाओ में इसके अलग-अलग रंग देखने को मिलते है ... बचपन में पिता ही सबकुछ होते है.. बिलकुल एक सुपरहीरो के तरह, सर्वशक्तिमान  ...वो सब जानते है ...वो सब कर सकते है ...

किशोरावस्था में पिता हिटलर सरीखे नज़र आते है ... हम पर पैनी नज़र रखने वाले , हमेशा पढने के लिए कहने वाले , हमें हर बात पे टोकने वाले और गलती करने पर  प्रताड़ित करने वाले , इस समय अपने पिता हमें सबसे बुरे लगते है और मित्रों के पिता सबसे उम्दा नज़र आते है और मन में बार-बार एक ही ख्याल  आता --- काश ! हमारे पापा भी पिंटू के पापा की तरह होते ... देखो कैसे और कितनी  जल्दी उसकी हर मुराद पूरी करते रहते है ...

१८ साल के व्यस्क होते ही दोस्त ज्यादा प्रिय हो जाते है , पिता की हैसियत  एक पैसे देने वाली ATM मशीन सरीखी हो जाती है , उन जितना कम रूबरू हुआ जाए उतना अच्छा नहीं तो कपड़ो , आदतों , मित्रों , और दिनचर्या पे लम्बे-लम्बे व्याख्यान सुनने को मिलेंगे , पिताजी अगर एक  दरवाजे से कमरे के अन्दर  घुसते है  तो बेटा दूसरे दरवाजे से तुरंत बाहर कट लेता है , व्यर्थ के वाद-विवाद में कौन पड़े ? ... पिता  मज़बूरी की वजह से जरुरी  नज़र आने लगते है ... आंखिर उन पर अपनी सम्पूर्ण आर्थिक निर्भरता जो होती है ...

शादी के समय पिता सबसे ज्यादा जरुरी होते है , निर्णय लेने के लिए नहीं अपितु हमारे निर्णय को वहन करने के लिए और थोडी बहुत सामाजिक औपचारिकताओं के निर्वहन हेतु ...

संतान उत्पत्ति  के उपरांत उसके  पालन-पोषण आने वाली दिक्कते हमें पिता की असल अहमियत समझती है और हमें अपने पिता को एक नयी नज़र से देखने को बाध्य कर देती है , हम बार-बार ये सोचने में मजबूर हो जाते है कि हम से एक नहीं संभल रहा हम तीन-तीन भाई बहनों को माँ-पिताजी ने कैसे संभाला होगा ?

रोजी –रोटी की दौड़ में मसरूफ हम लोगों का बार-बार माँ-पिताजी से आग्रह रहता है के वो हमारे साथ आकर रहे , हमारे बच्चे दो-चार अच्छी बातें सीख लेंगे , उन्हें अच्छे संस्कार मिलेंगे और हमें सुकून कि  हमारे अनुपस्थिति में घर का कोई अपना बच्चो की देखभाल के लिए है ....पर अपने इस स्वार्थ में हम उनकी स्वतंत्रता को सीमित कर देते है और उन्हें मजबूर कर देते है के वो अपनी जड़ो से दूर इस तंग महानगरीय जीवन को जीयें जहाँ पास-पड़ोस के कोई मायने ही नहीं ...

बढ़ती जिंदगी अनेकों जटिलतायें  लेकर आती है , हमें अपने प्रभुत्व को दर्शाने के लिए हमेशा सबसे बेहतरीन ,अनावश्यक भौतिक साधनों की दरकार रहती है और इसके लिए एक आशा भरी नजर पिताजी की ओर ही लगी रहती है कि वो हमारी मदद करें जो अक्सर भाई- बहनों में आपसी  खीचतान का सबब बनती है ...पिताजी के इच्छा , मर्जी या चाह कोई मायने नहीं रखती उन्हें तो बस अपनी जरूरत बता दी जाती है और वो भी बड़े ही रूखे अंदाज़ में ...

पिताजी केवल आपकी जरूरत पूर्ति का साधन नहीं , उनकी भी एक अपनी जिंदगी और सोच है , जीवनभर संघर्षरत इस योद्धा को भी विश्राम और सुकून चाहिए, उनपे अपने निर्णय इस करके न थोपिए कि वो तो अपनी जिंदगी जी चुके और उम्र के इस पड़ाव में उनका दायित्व संतान की मदद के अलावा कुछ अन्य नहीं ...उनसे आग्रह करें नाकि भावुकता की चासनी में लिपटे हुए आदेश दें ...

बड़े –बूढ़े एक विशाल वट वृक्ष की भांति है जो अपने आश्रय से सबको जोड़े रखते है , जिनमें जीवन के अनुभव प्रचुर मात्रा मौजूद है जो अमूल्य है ... समय निकालिए उनसे बात करिये , संवाद की शक्ति को पहचानिए ,फ़ोन पे केवल हाल-चाल पूछने भर की औपचारिकताओं तक सीमित न रह जाईये  उनके पास भी बताने के लिये एक से एक बढ़कर  रोचक किस्से हैं जोकि आज तक उन्होंने आपको नहीं बतायें , मसलन उनका बचपन , उनकी पहली नौकरी , उनका पहला प्यार , उनकी हॉस्टल लाइफ , उनके सुट्टे का पहला कश यकीन मानिये आप बिलकुल भी बोर नहीं होंगे और आपको अपने एकदम से बिलकुल नए पापा के दर्शन होंगे...

याद रखें जैसा बोयेंगे आगे वैसा ही काटेंगे ... पिताजी हमेशा साथ नहीं रहने वाले और उम्र के इस पड़ाव पे सबसे बेहतरीन पे पहला  हक़ उनका है ...

Wednesday, 1 April 2015

छज्जे पे उगी पीपल सा

अड़ियल , जिद्दी , ढीठ
कुछ छज्जे पे उगी पीपल सा 
विपरीत परिस्थितियों में 
पनपता रहता मै , अपने 
सम्पूर्ण उन्मूलन की आशंकायें लिए.. 

न मेरी उस जैसी  कोई चाह 
के अपने विस्तार से 
अहित करूँ किसी का भी 
पर मुझ से आशंकित 
तत्पर रहते तुम क्यों ?
मेरे समूल विनाश के लिए ...

तुमने तो न दी जमीन , 
न खाद न पानी 
फिर भी स्वतः  पा गया जीवन मै 
तुम्हारे विलासी दृष्टी से बच 
पर थोड़ा जो पुष्ट हुआ 
खटकने लगा मै  तुम्हे 
तुम्हारे छज्जे पे उगे पीपल सा... 

तुम डरे, चिंतित, व्याकुल 
तुम्हारे अन्याय के खिलाफ 
मेरे इस अल्प अतिक्रमण से 
दौड़ पड़े सहसा 
सम्पूर्ण दल-बल लिए 
और अपने दुर्ग के रक्षण हेतु 
तुमने मुझे  उखाड़ फेका जड़ से  
बिना किसी विलम्ब 

पर फिर उगूंगा मै 
तुम्हारे आस-पास ही कहीं  
और प्रकट करता रहूँगा 
तुम्हारे सम्मुख 
तुम्हारे कृत्यों पर  
अपना यह  शांत प्रतिरोध...

Wednesday, 18 March 2015

रिश्ते कब होते है
सीधे सपाट
हो जाते अक्सर
हमारे अहम का शिकार

जाने-अनजाने
पड जाती कितनी गांठे
और हम  कर देते
एक दूसरे को अस्वीकार

फिर  बार-बार आता
एक ही ख्याल
बोलना चाहिए था
थोड़ा सोच विचार



 

Sunday, 15 March 2015

***GSVM Medical college में हमारे समय में प्रचलित कुछ short forms (भावार्थ सहित)***
1. KLPD - अत्यधिक श्रम के उपरान्त अपेक्षित परम आनंद की प्राप्ति होने के जरा सा पहले सब कुछ गुड-गोबर हो जाना ....हाथ आना पर मुंह को ना लगना ....
2. MCA - College बंटने वाला एक ऐसा अनुदान जो बालको इस जन्म में तो कभी भी नहीं मिल सकता...
3. NCNCNNJK - ये ऐसे नखरे है जो चिरकाल से जारी है और चिरकाल तक जारी रहेंगे ...जब तक इनको उठाने वाले जिंदा है...
4. LLT -नौसीखियो की ऐसी परीक्षा जिसको लेने वाला यह मानता है की उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान मिल चुका है...
5. BBC -ऐसी उपाधि जो नियमित रूप से 'बहुत ही बड़ा उछालने' वालो को मिलती है...
6. FRCS -कॉलेज के शुरू के दिनो में वरिष्ठो द्वारा प्रदान की जाने वाली instant डिग्री...
7. MD- वो ही प्रक्रिया जो महाभारत में गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन के शरीर को वज्र समान कठोर बनाने के की थी ...यह कार्य यहाँ वरिष्ठो द्वारा कार्यान्वित होता है
8. PLD -प्रचंड युवाओ को मिलने वाला ख़िताब जिससे वो जीवन भर गौरवान्वित होते रहते है...
9. MLD -दुर्घटना स्वरुप मिला ख़िताब जिसका जिक्र न ही हो तो बेहतर
10. DLP - ऐसी सुस्त,ढीली-ढाली हस्ती जिससे कछुवा भी शर्मा जाये...
11. WT -एक ऐसा जोखिम जिसे उठाने वाला अगली बार भी इसे उठाने को लालायित रहता है ...
12. SAKAKU - लडकियों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले very simple, non malignant so called अपशब्द...
13. GH - ऐसा महल जिसके अन्दर क्या होता है ये जानने की प्रबल उत्सुकता बाहर हर किसी में होती है...
14. BH -एक ऐसा किला जिसकी मजबूत दीवारे बिलकुल ही पारदर्शी है ...अन्दर क्या हो रहा है ये जगजाहिर है...
15. DH-एक ऐसा विशाल कक्ष जहाँ ची-ची कर सरकते धातु के बने स्टूलो की धव्नि के मध्य पढाई गई बातो का सबसे ज्यादा OHT i mean Over Head Transmission होता है...
16. LT- Wooden benches के ascending order वाला वो स्थान जहाँ बैठ सामने से आते हुए चेहरों को निहारने में घोर आनंद का अनुभव होता है ...व्याख्यान से पूर्व के 15 min, एक घंटे वाले व्याख्यान से ज्यादा रसदाई होते है...
17. NS- एक ऐसी supply जो चाहे हो न पर seniors इसके बारे हरदम पूछते रहते है ...
18. PG-एक ऐसी गाजर जो पूरे MBBS हमेशा आँखों के आगे लटकी रहती है....Internship में यह हड्डी में परिवर्तित हो जाती और इसके लिए श्रमदान करने वाले कुत्तो में...
19. DP-तनाव मुक्ति के लिए बूढ़े पुजारी की उपस्थिति में होने वाला एक ऐसा भव्य अनुष्ठान जो आदिकाल से कॉलेज परिसर में होता आया है और आगे भी सदैव होता रहेगा...
20. BC - 'कॉलेज की आत्मा '...कानो में रस घोलती वो मधुर धव्नि जिसको उत्पन्न करने वाले और सुनने वाले सभी लोग दिव्यता को प्राप्त करते है ...

Thursday, 12 March 2015

हम थे मसरूफ अपने
रोजमर्रा के कामों में
अपनी सहूलियतों के हिसाब से
तरजीह दे उनको  निबटाने में

ख्वाहिशो की परवाज पे  सवार
खुद की ही  सोच 
और सब से अनजान 
इस बीच 
पता ही नहीं चला
मां-बाप कब बूढ़े हो गए ?

Monday, 2 March 2015

कुछ कड़वी यादों को अगर छोड़ दे तो अतीत हमेशा प्यारा ही लगता है , उसमें अच्छा या बुरा  सब कुछ घटित जो हो चुका होता है , वर्त्तमान का  बिना फल वाला संघर्ष या फिर भविष्य की अनिश्चतता    नहीं होती और अपनी  त्रुटियों को सुधार कर आगे के   जीवन को बेहतर बनाने की बहुत सारी सीख भी होती है... 

आज से पच्चीस वर्ष पहले त्यौहार इतने व्यवसायिक न थे , बाजारवाद इतना हावी न था जो हमारी सोच को प्रभावित कर सके , जश्न मनाने का तरीका अपनापन लिए हुए था , एक दूसरे के सहयोग से काफी काम होते , मानवीय स्वाभाव की मूलभूत खामियां उस समय भी थी पर आज के जैसा अपनी विशिष्ठता का अहंकार न था ....

होली के दिनों की अपने उस सुनहरे अतीत की यादें आज भी मुझे अपनी जमीन से जोड़े रखती है और अपने  द्वारा ही बनाये गए इस भागदौड़ भरे मौहोल में संभवतः संरक्षित करती है मेरे वजूद को ..... ........................................................................................................................

होली से दस  दिन पूर्व  पास-पड़ोस की आंटियों का जमघट आज हमारे घर पर है , आज पापड़ और चिप्स बनाने का प्रोग्राम है , कल शाम ही सब्जी मंडी से ३ धड़ी आलू मंगवा लिए गए  थे , परचून से साबूदाना, मसालें  और तेल भी आ चुका है , पिछले साल खरीदे  हमारे पहले फ्रिज की पन्नी को माँ ने उस समय धोकर  सहेज के रख लिया था और आज उसके उपयोग का दिन आ ही गया  , घर के पांच लीटर के प्रेशर कुकर से आज बात नहीं बनेगी इसलिए मेहता आंटी के यहाँ से उससे बड़ा प्रेशर कुकर मंगवा लिया है , ईमानदस्ता पन्त जी के यहाँ से मंगवाया गया है, पूरे मौहल्ले भर एक ही तो ईमानदस्ता है जो जरूरत के समय हर किसी के घर घूमता रहता है , हमारे  घर का कद्दूकस अपनी धार खो चुका  है , इसमें कसने से आलू के बढ़िया चिप्स नहीं निकल पाएंगे यह जानकर माँ ने कल शाम को ही बबलू के यहाँ से उनका इम्पोर्टेड वाला कद्दूकस मंगा लिया था ... 

इतने सारे पापड़ , चिप्स , कचरी आदि को  बनाने में बहुत सारी गैस लगने वाली है और गैस एजेंसी के नखरे और  त्यौहार के वक्त सिलिंडर के लिए मची मारामारी  के मध्य गैस खत्म होने का जोखिम  नहीं लिया जा सकता इसलिय अपना पुराना मिटटी के तेल से चलने वाला स्टोव भी निकाल लिया गया है , महरी जो अक्सर हमारे राशन कार्ड से मिटटी का तेल ले जाती  है उससे दो लीटर यह जीवश्मीय ईंधन  आज के इस खाद्य सामग्री निर्माण कार्यक्रम के दौरान आवश्यक अतिरिक्त उष्मीय ऊर्जा की जरूरत को पूर्ण करने के लिए मंगवा लिया गया है ...

स्कूल से बचने का इससे बढ़िया बहाना मुझे क्या मिलेगा ? इसलिए माँ के बार-बार मना करने पर भी आज मै इस स्कूल नहीं गया  इस तर्क के साथ के अगर बीच में किसी समान की जरूरत पड़ गयी तो भाग दौड़ कौन करेगा ??

आंटी लोगों का हमारे घर जमवाड़ा लग चुका है , पिताजी कॉलेज जा चुके है इसलिए पुरुष विहीन इस घर में बिना किसी संकोच के उनका आपसी हंसी मजाक से सराबोर  वार्तालाप प्रारंभ है, बीच –बीच में जोर-जोर से खुल के हंसने के स्वर भी वातावरण में गूंज रहे हैं  .... पूरे साल भर घर  एक जैसे काम में अपने को खपाने वाली इन मेहनतकश घरेलू महिलाओं को आज इक्कठा हो कुछ अलग करने को जो मिला है और फाल्गुन की मस्ती भी तो अपना थोड़ा बहुत असर दिखाएगी ही ...

थोड़े से विचार-विमर्श के उपरान्त आज के होने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार कर ली गयी है , आलू गैस और केरोसिन स्टोव पे उबलने के  लिए चढ़ा दिए गए है , कुछ आलू छीले जा रहे है , ये मैले कुचैले से ,आवरण विहीन हो कितनी जल्दी एक नवीन रूप को धारण कर रहे है और फिर कद्दू कस से कसे जाने के उपरांत अपना पिंडिय स्वरुप खोकर धारी युक्त हो ये और भी  आकर्षक लग रहे है, रात भर का भीगा हुआ साबूदाना भी बड़े से  डेग में उबल पारदर्शी हुआ जा रहा है , तभी माँ ने गाना शुरू किया 

शिव के मन माहि बसे काशी -२
आधी काशी में बामन बनिया,
आधी काशी में सन्यासी, 
शिव के मन माहि बसे काशी -२
काही करन को बामन बनिया,
काही करन को सन्यासी, 
शिव के मन माहि बसे काशी -२
पूजा करन को बामन बनिया,
सेवा करन को सन्यासी, …
शिव के मन माहि बसे काशी -२
काही को पूजे बामन बनिया,
काही को पूजे सन्यासी, 
देवी को पूजे बामन बनिया,
शिव को पूजे सन्यासी, …
शिव के मन माहि बसे काशी -२
क्या इच्छा पूजे बामन बनिया,
क्या इच्छा पूजे सन्यासी, 
शिव के मन माहि बसे काशी -२
नव सिद्धि पूजे बामन बनिया,
अष्ट सिद्धि पूजे सन्यासी, 
शिव के मन माहि बसे काशी -२

और बांकी सारी महिलओं का स्वर पा शरीर के रोमों को जागृत करता यह  गायन कितना दिव्य सा प्रतीत हो रहा है ....

आलू उबल चुके है , उन्हें छील, फोड़ कर पापड़ बनाने की  अन्य सामग्री और मसालों को मिलाने के दौरान  पता  चला कि हींग तो घर में ख़तम हो चुकी है, वार्ष्णेय जी ने पिछले साल ये डल्ले वाली हींग हाथरस से भेजी थी ,  खुशबूं में बेजोड़ बहुत जरा सी  लगती थी और  किसी भी खाने के स्वाद में चार चाँद लगा देती , खासकर जब दाल में इसका तड़का लगता तो मुख में लार के स्राव को प्रेरित करती  इसकी महक हर किसी के भूख जगा देती और पिताजी कह ही उठते “ श्रीमती जी अगर खाना बन गया हो लगा दो , तुम्हारे से तडके की गंध ने मेरी भूख जगा और बड़ा दी है ...

माँ को अपनी इस विशेष “हाथरसी हींग” को खत्म होने का मलाल  था और साथ ही साथ चिंता भी कि इस बार के  बने पापड़ो में शायद पिछले साल जैसी लज्जत  न हो , खैर मुझे इस हिदायत के साथ कि “लाला से कहना की बढ़िया हींग दे”, बाज़ार दौड़ा दिया गया , मै प्रसन्न था कि मुझे कुछ काम मिल गया और साथ ही साथ स्कूल न जाने के अपने फैसले को पुष्ट करती एक वाजिब वजह 

उबले आलुओं का मसाले और तेल युक्त गुन्द्का गूंध लिया गया है , हल्की पीली पृष्ठभूमि में चमकते लाल मिर्च और जीरे के काले  दाने इसके स्वादिष्ट होने का अहसास करा रहे है , मेरा मन तो इसे ऐसे ही खाने को मचल रहा है पर फिलहाल माँ के गुस्से के आगे ऐसा संभव नहीं ...

पन्नी के मध्य रख आलू की इस लोई को बेलते  समय हमारे लकड़ी  वाले चकले पे ध्यानी आंटी को असहजता  अनुभव हुई तो उन्होंने मुझे बुला के कहा – जा हमारे घर दौड़ के जा , दादी मिलेंगी उनसे कहना मैंने संगमरमर वाला चकला मंगवाया है ... उनके आदेश का तुरंत अनुपालन हुआ और मैं दौड़ के उनका इच्छित समान ले आया ...  इस कार्य में सम्मलित हो अपने योगदान के यह अनुभूति मुझे कितना हर्षा रही है  ... 

आलू के पापड़ बनने के बाद लम्बी सी पन्नी सूखने के लिए धूप में डाल दिये गए है , चिप्स भी माँ की धोती में सूर्य देव उन्मुख हो सूख के अकड़ रहे है , शायद अपने स्वरुप को खोने का शांत प्रतिरोध जता रहे  है, साबूदाने के पापड़ अपने सफ़ेद दानों के साथ अभी काफी गीले है , चावल की कचरी हाथ से चलने वाले इस मशीन से निकल अपने अवस्था परिवर्तन के दूसरे दौर में कितनी नाजुक लग रही है , जरा से ही हिलाने   से अपने स्वरूप को खो देने वाली ...

छत पे चलती हवा के मध्य मै थपकी , ईंट ,पत्थर , पुराने लोहे के पाइप , पुराने ख़राब ताले, अपने क्रिकेट के बल्ले और स्टम्प से पन्नी , मां और दादा जी इन फ़ैली हुई धोतियों  को दबा रहा हूँ जिनपे होली की यह विशेष खाद्य सामग्री सूखने हेतु  विराजमान है , माँ की  नजरों से बच ,  मन में उत्पन्न हड़बड़ी और  इनके  सूख जाने के न ख़त्म होते इंतज़ार के  बीच इन अधसूखे कच्चे पापड़ो का स्वाद ले चुका हूँ... उड़ते पक्षियों से इनके रक्षण का भार भी आज  मेरे ही  कंधो पे  है ....

आज हमारे घर का होली के अवसर पे होने वाला यह सामूहिक कार्य निबट चुका है , कल शाह आंटी के घर की बारी है और हास-विनोद करता महिलाओं का यह विशेष जमघट कल उनके घर ही लगेगा ...  कार्य सकुशल समाप्त  होने के  सुकून के मध्य चाय की चुस्कियां लेते हुए फाल्गुन का सत्कार गीतों के माध्यम से एक बार  पुनः प्रारंभ  है 

जल कैसे भरूं यमुना गहरी ..."
ठाड़े भरूं रजा राम देखत है
बैठे भरू भीजे चुनरी
जल कैसे भरूं यमुना गहरी ..."

विभिन्न घरो से एकत्र सामग्री को लौटने की जिम्मेदारी के मध्य मुझे इंतज़ार है अगले हफ्ते का जब ये संगठित नारी शक्ति पुनः हमारे घर कदम रखेगी , स्वादिष्ट गुजिया, मठरी, सेव और नमकपारे बनाने  करने  के लिए ....