Sunday, 19 July 2015

पिताजी कैसे बदल दे एकाएक से अपने आप को...

दो जोड़ी कपड़े ही 
तन के लिए पर्याप्त थे 
दूर के सरकारी स्कूल के 
हेडमास्टर साहब लाजवाब थे... 
कई मील रोज 
पैदल जाने की कसरत  थी 
और जी तोड़ मेहनत से
अपनी किस्मत बदलने की हसरत थी 
न घोड़ा गाडी , न कार 
न बस न स्कूटर न हवाई जहाज 
पर बहुत ऊँचे थे उनके ख्वाब...

दादा कृषक थे गेहूं उगाते थे 
और उसे पिसा हाट में बेचने जाते थे 
कम में ही गुजारा होता था 
और ईश स्तुति कर 
परिवार सुख चैन न खोता  था 
देख दिखावे का न कोई  शोर था 
बच्चों की पढाई पे ही जोर था.... 

पैरों में जूते तक न होते थे
साबुन की  पिल्ली टिक्की से 
वे अपने  सर को धोते थे 
किसी विवाह-समारोह में जाना 
भयंकर मानसिक द्वन्द था 
खद्दर के निक्कर में भी पैबंद था

स्कूल की फीस तक जुटाने में 
पसीने छूट जाते थे 
पैसे बचाने के लिए 
खुद ही खाना बनाते थे 
शहर के  कुछ 
सबल रिश्तेदारों का अहसान था 
पर मन उनकी फब्तियों से 
कितना परेशान था .... 

पढ़ लिख जल्द से जल्द 
सरकारी नौकरी पाने का ही ख्वाब था 
दादी-दादी के घोर कष्टों का
हृदय बीधता प्रबल अहसास था 
छोटे भाइयों की जिम्मेदारी उठानी थी 
बहनों के हाथों हल्दी भी लगानी थी... 

नौकरी पा अपने कर्तव्यों का 
निर्वहन करते गए 
दिन प्रतिदिन नयी पीढी के 
खर्चे भी बढ़ते गए 
सारे पुराने उधार चुकाते गए 
भविष्य सुरक्षित रखने के लिए 
बचाते भी गए...

न बाहर होटलों में कभी  खाया 
न किसी वर्ष अपना जन्मदिन  मनाया 
न शनिवार शाम की कॉकटेल पार्टी थी 
न कोई AC कार हफ्ते भर में ही 
टैंक भर तेल खाती थी
न माल न शौपिंग 
न घूमने फिरने का खर्चा था 
न नित्य नए खरीदे 
इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से 
समय और चैन  का हर्जा था ...

अपना एक गरम सूट कई वर्षो चलाया 
पर हमें अच्छे से अच्छे स्कूल में पढ़ाया 
सीमित साधनों में उनके प्रबंध अच्छे थे 
उनकी पहली प्राथमिकता उनके बच्चे थे ....

अपने पे वो आज भी खर्च नहीं कर पाते है 
हम बच्चे उनकी इस बात पे 
कितना नाराज हो जाते है 
हमें जरुरत नहीं तो अब  
पैसे किसके लिए बचाते हो 
क्यों नहीं  घर का ये पुराना सामान बदल 
नया लेकर आते हो ?
फ़ोन पे  बार-बार ये ही बतियाना 
हमारी उनसे नाराजगी का कारण बन जाता है 
पर उनका गुजरा समय 
हमें कहाँ कब याद आता है ?

अतीत के कष्टों की 
उनके हृदय में आज भी टीस है 
मितव्ययी होने की हमको 
उनकी नेक सीख है
कहते है शिक्षा नहीं देते अपने बाप को 
पिताजी कैसे बदल दे 
एकाएक से अपने आप को...

Wednesday, 8 July 2015

कुछ अक्षम्य कृत्य....

कुछ अक्षम्य कृत्य
कुछ प्रयाश्चित विहीन गलतियाँ
सतत अपराधबोध लिए
कितना कचोटता रहता
अपना यह मन....
होता कितना पश्च्याताप
बार-बार अतीत में जाकर
अपने आचरण की त्रुटियों को
सुधारने की न संभव हो सकने वाली
कल्पनाओं में विचरना हमें आता पसंद
पर बीता समय तो होता
पत्थर की अमिट लकीर की तरह
जिसे नकारना, बदलना,भूलना
होता भरे दिन में
खुली आँखों से देखना स्वप्न ...

लीजिये सीख अपने इतिहास से
और करिये हर संभव प्रयत्न
न हो वर्तमान और भविष्य में
मन वचन कर्म से जाने-अनजाने
पुनरावृत अपने कलंक

Saturday, 4 July 2015

पुराना घर अब भी वहीँ है.…

मकानों की तादाद पहले से ज्यादा है
गली के नुक्कड़ पे भी भीड़ बेताहशा है
बगल का बाग न जाने कहाँ खो गया है
किसने ये ढेर सारा  यह कंकरीट बो दिया है
दौड़ते बच्चों की अब आवाज़ नहीं आती
पड़ोस की आंटी कटोरे में खीर नहीं लाती
न पुलिस को चोर की तलाश है
न आईस-पाईस के धप्पे पे शोर बेहिसाब है
बचपन टीवी , मोबाइल में सिमट गया है
आगे बढ़ा कि नीचे धंस गया है ???
इतने अनजान  चेहरों के बीच
पहचाना कोई नहीं है
पुराना घर अब भी वहीँ है …

लोहे का गेट जंग खाया सा  है
बागीचे में झाड़ उग आया सा है
हैंडपम्प सूखा सूखा सा है
रंग दीवारों का रूठा-रूठा सा है
खिड़कियों की जलियां धुल में सनी है
छत पे  बस  डिश  की  छतरी ही  नई है
दीमक खा  गया है सारी  फंटियों को
ढीली पडी साल की चौखट की सुध किसको ?
शीशम  का दरवाजा पानी  पा अकड़ गया है
उसका कुंडा भी कबका बिगड़ गया है
दो बूढ़ी आत्मायें सशरीर जमी है 
पुराना घर अब भी वहीँ   है....

बरामदे  में अब पानी ठहरता है
बैठा हुआ दानेदार मार्बल का फर्श
मरम्मत के लिए कहता है
बिजली के सफ़ेद बटन मटमैले हुए
कितने फोटो फ्रेम अब टेढ़े हुए
वाश -बेसिन  का नल बेहिसाब टपकता है
उखडती पपड़ियों के बीच
दीवार का पहले वाला रंग  दीखता  है
बाथरूम की फिटिंग्स सारी ढीली हुई
सीलन से दोछत्ती  भी गीली हुई
कानिस में रखा सामान तितरबितर है 
काली पड़ी रसोई की छत की अब किसको फिकर है 
पता नहीं क्या गलत और  क्या सही है
पुराना घर अब भी वहीँ है.…

न घंटी बजा कुल्फी बेचने वाला है
न बुढिया के बाल न दूधियाँ गोले वाला है
मदारी  अब भालू नहीं लाता
संकरी हो चुकी गली में अब हाथी नहीं आता
काली माई बन के  कोई नहीं डराता
डुगडुग्गी पे अब बन्दर का नांच  नहीं
बाईस्कोप में झांकना बीते कल की बात हुई
अपनी आसमानी तरक्की की यहीं तो कमी है
पुराना घर अब भी वहीँ है …

इस आँगन का पला बड़ा बच्चा
कहीं दूर निकल गया है
खुद ही में खो शायद
रास्ता भटक गया है
इसलिए बूढ़ी आँखों को
अब किसी से कुछ आस नहीं
अवसान की इस बेला अब फ़रियाद नहीं
मकान को घर बनाने वाला अब थक गया है
विश्राम करने के लिए  रुक गया है
जितना हो सके अब उतना ही करता है
पर ये वीरानापन उसे खूब अखरता है
स्वाभिमान से  जीने में ही उसकी ख़ुशी है
पुराना घर अब भी वहीँ है.…

जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं ...

हर साल सर के  बाल  कम हो जाते है
बचे बालों में और भी  चांदी पाते  है  
चेहरे पे झुर्रियों की तादाद  बढ़ा जाते है 
रीसेंट पासपोर्ट साइज़ फोटो में  
कितना अलग नज़र आते है 
“अब कहाँ पहले जैसी बात “ कहते जाते है 
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

सुबह की सैर में चक्कर खा जाते है 
सारे मौहल्ले को पता पर हमसे छुपाते है  
दिन प्रतिदिन अपनी खुराक घटाते है  
और तबियत  ठीक होने की बात फ़ोन पे बताते है 
ढीली हो गयी पतलून को  टाइट करवाते है
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

किसी के देहांत की खबर सुन घबराते है 
और अपने परहेजो की संख्यां  बढ़ाते है  
हमारे मोटापे पे हिदायतों के ढेर लगाते है 
‘तंदुरुस्ती हज़ार नियामत "हर दफे  बताते है 
"रोज की वर्जिश"  के फायदे गिनाते है  
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

हर साल बड़े शौक से बैंक जाते है 
अपने जिन्दा होने का सबूत दे कितना हर्षाते है  
जरा सी  बड़ी पेंशन पर फूले नहीं समाते है 
एक और नई  FIXED DEPOSIT करके आते है
खुद के लिए नहीं हमारे लिए ही बचाते है  
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

चीज़े रख के अब अक्सर   भूल जाते है 
उन्हें  ढूँढने में सारा घर सर पे उठाते है 
और मां को पहले की ही तरह हड़काते है 
पर उससे अलग भी नहीं रह पाते है 
एक ही किस्से को  कितनी बार  दोहराते है 
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

चश्मे से भी अब ठीक से नहीं देख पाते है 
ब्लड प्रेशर की  दवा लेने में आनाकानी मचाते है 
एलोपैथी  के साइड इफ़ेक्ट बताते हैं 
योग और आयुर्वेद की ही  रट लगाते हैं 
अपने ऑपरेशन को और आगे टलवाते है 
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

उड़द की दाल अब नहीं पचा पाते है 
लौकी , तुरई और धुली मूंग ही अधिकतर खाते है 
दांतों में अटके खाने को  तिल्ली से खुजलाते है 
पर डेंटिस्ट के पास कभी नहीं जाते  है 
काम चल तो रहा है की ही  धुन लगाते है 
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

हर त्यौहार पर  हमारे आने की बाट जोहते जाते है 
अपने पुराने घर को नई दुल्हन सा चमकाते है 
हमारी पसंदीदा  चीजों के  ढेर लगाते है 
हर  छोटे-बड़ी  फरमाईश पूरी करने  के लिए 
फ़ौरन  ही बाजार  दौडे चले जाते   है 
पोते-पोतियों से मिल कितने  आंसू टपकाते है 
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं  ...

Saturday, 27 June 2015

ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना 
वो अपने बाल खुद न काढ पाना 
पी टी  शूज को चाक से चमकाना 
वो काले जूतों को पैंट से पोछते जाना  
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो बड़े नाखुनो को दांतों  से चबाना 
और लेट आने पे मैदान का चक्कर लगाना 
वो prayer के समय class में ही रुक जाना 
पकडे जाने पे पेट दर्द का बहाना बनाना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो टिन के डिब्बे को फ़ुटबाल बनाना 
ठोकर मार मार उसे घर तक ले जाना  
साथी के बैठने से पहले बेंच सरकाना 
और उसके गिरने पे जोर से खिलखिलाना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

गुस्से में एक-दूसरे की  कमीज पे स्याही छिड़काना 
वो लीक करते पेन को बालो से पोछते जाना 
बाथरूम में  सुतली बम पे अगरबती लगा छुपाना 
और उसके फटने पे कितना मासूम बन जाना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो games period के लिए sir को पटाना 
unit test को टालने के लिए उनसे गिडगिडाना 
जाड़ो में बाहर धूप में class लगवाना 
और उनसे घर-परिवार के किस्से  सुनते जाना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो बेर वाली के बेर चुपके से चुराना 
लाल –काला चूरन खा एक दूसरे को जीभ दिखाना 
जलजीरा , इमली देख जमकर लार टपकाना 
साथी से आइसक्रीम खिलाने की मिन्नतें करते जाना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो लंच से पहले ही टिफ़िन चट कर जाना 
अचार की खुशबूं पूरे class में फैलाना 
वो पानी  पीने में जमकर देर लगाना 
बाथरूम में लिखे शब्दों को बार-बार पढके सुनाना   
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो exam से पहले गुरूजी के चक्कर लगाना 
लगातार बस important ही  पूछते जाना 
वो उनका पूरी किताब में निशान लगवाना 
और हमारा ढेर सारे  course को देख चकराना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो farewell पार्टी में  पेस्ट्री समोसे खाना 
और जूनियर लड़के का ब्रेक डांस दिखाना 
वो टाइटल मिलने पे हमारा  तिलमिलाना 
वो साइंस वाली मैडम पे लट्टू हो जाना 
ऐ मेरे स्कूल मुझे जरा फिर से तो बुलाना ...

वो मेरे स्कूल का मुझे यहाँ तक पहुचाना 
और मेरा खुद में खो उसको भूल जाना 
बाजार में किसी परिचित  से टकराना
वो जवान गुरूजी का बूढ़ा चेहरा सामने आना ...

तुम सब अपने स्कूल एक बार जरुर जाना .....

Tuesday, 19 May 2015

जेठ की  इस भरी दोपहरी खाना खाकर सब सुस्ता रहें है , माँ की जबरदस्त हिदायत भरी चेतावनी  है -- बाहर लू चल रही है , खबरदार अगर घर के बाहर पैर भी रखा तो , तू  सोयगा तो है नहीं और  कुछ न कुछ खुराफ़ात तो जरुर करेगा ही पर ध्यान रहे  कि  कोई भी खटर-पटर न हो , अगर तेरे मचाये शोर से तेरे पापा जग गए तो मै तुझे बचाने नहीं आऊँगी ...

माँ इतना कुछ कह अन्दर के कमरे में सोने चली गयी ... उसकी रोज की व्यस्त दिनचर्या में सुस्ताने का ये ही तो अल्प समय है , इस मध्यमवर्गी परिवार में एक  वो ही शेषनाग है जिसने सम्पूर्ण गृहस्थी का बोझ संभल रखा है ... पिताजी का काम पैसे कमाने और बाहर के छोटे-मोटे कामो का अलावा ज्यादा कुछ और नहीं और  घर के सारे कामो की जिम्मेदारी तो इसी के कंधो पे है ... मेहरी , धोबी , और माली की शाही  सुविधा इस बचतोन्मुख परिवार में कहाँ ?

सुबह जल्द उठ के पानी भरना , सम्पूर्ण घर की झाड़ू बुहारी और पोछा, नहा-धोकर मंदिर में दीया जलाना , दूध वाले से दूध लेना और उससे दूध के पतला होने की झिक-झिक करना , सबके लिए चाय बनाना और उसे उनके बिस्तर तक पहुचना , घर के अपने छोटे से खेत के गुड़ाई करना ,पौंधो में पानी डालना , सबके लिए नाश्ता बनाना और उसके उसके उपरांत लगे बर्तनों के अम्बार को अपने हाथो के करतब से चमकाना और इस बीच दरवाजे पे कोई मांगने वाला आ जाय तो उसे कभी भी खाली हाथ न लौटने देना , मेतरानी की भी सुनना और उसे भी चाय पिलाना और  रोटी –सब्जी खिलाना ...

सुबह के काम से निबटना और दोपहर के में जुट जाना , ये वो समय है जब न तो रसोई गैस की सुविधा है और ना हीं पिसे मसालों का विलासी सुख  , केरोसिन स्टोव , बुरादे के अंगेठी और सिल -बट्टे  से ही जूझना है ,फूंकना है और काले हाथ ,ललाट लिए, पसीने से तरबतर हो बस जुटे ही रहना है  ...बचत के लिए थोडा अधिक शारीरिक श्रम कर लेना ही मानसिकता है और हो भी क्यों ना , वर्तमान के ये थोड़े-बहुत अतिरिक्त श्रम अतीत  के विकराल  अभावो  के सम्मुख  कितने बौने जो नज़र आते है...

खैर घर में सब सो चुके है , पिताजी के खर्राटे मुझे उनके  गहरी नींद में होने की अवस्था से   आश्वस्त करा रहे है , यही सही मौका घर से बाहर निकलने का , चप्पल पैरो से निकाल के हाथ में पकड़ ली है , मेन दरवाजे के कुंडी जो पिछली दफा मेरे पकडे जाने का कारण बनी थी उसे कल रात ही सिलाई मशीन के तेल से सराबोर कर शांत किया जा चुका है , घर के लोहे के  गेट को खोलने से उत्पन्न आवाज़ का जोखिम नहीं लिया जा सकता इसलिए दीवार फांदना ही उचित रहेगा और समस्त बाधाओं को पार कर मै घर के पास की इस पसंदीदा बगिया में पहुँच चुका हूँ जहाँ चारो ओर आम के पेड़ो की बहुतायत है , और ये क्या ? पिंकू , रिंकू , नन्हे , कल्लू और बबलू भी अपने घर वालों को धता दे बाग़ में पहुँच चुके है ...

ढेले ,पत्थर इक्कठे किये जा रहे है , स्पर्धा इस बात की है कौन सबसे पहले अमिया पेड़ से  झडाऐगा , कलमी और फजली अमियाँ के पेड़ चुना गया है , ये मीठी जो होती है और अगर कोयल पद्दो मिल जाये तो और भी सोने पे सुहागा  ...दे दना दन पत्थर और ढेले फेंके जा रहे है और उनके लक्ष्य से जरा से चूकने का अपनी वाणी और सिर को  पकड़ के एक  बड़ा सा अफ़सोस भी मनाया जा रहा है , अचानक लक्ष्य भेद ही लिया गया , तीन  अमिया नीचे गिर चुकी हैं  , सब उन्हें  लूटने को दौड़ पड़े है और इस बहस के बीच कि  किसका निशाना लगा और ये गिरे हुए  अपरिपक्व फल किसके  है ,  दूर माली की गाली भरी आवाज़ कानो में पड़ रही है ... अपने आपसी  विवाद को भुला  सब के सब गिरी हुई अमिया को  उठाके  भाग रहे है हमारे घर के बाहर के  बरांडे की ओर जहाँ बैठ ,  मिल बाँट  हम सब अपनी इस मेहनत का  स्वाद लेंगे...

अपने इस सम्मलित प्रयास का मजा लिया  जा रहा है , अमिया की चेपी अच्छी तरह से  निकल ली गयी है , अब उसको हाथ से फोड़ के सबमें बांटा जा रहा है , पत्थर फेकने के कारण अपने मैले-कुचले हाथो को अपनी कमीज से पोछ सभी बालक अपनी माँओ  का काम बडा,  ख़ुशी-ख़ुशी अपनी इस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं , धूप कम होने   होने का बेसब्री से इंतज़ार है , शाम को बच्चो के यही चौकड़ी पतंगबाज़ी में अपने हाथ आजमाएगी...

इस गर्मी में वातानुकूलित   मॉल्स से फल खरीदते अपने अभिभावकों के साथ बच्चो को देख बार-बार मन में यही ख्याल आता है कि हमारी उन्नति हमारी संतानों को प्रकृति से कितना दूर ले जा रही है, चका-चौंध और चमक वास्तविकता  पर कितनी  हावी  है ...
पिता –पुत्र का सम्बब्ध अनेकों उतार-चढाव  वाला होता है, जीवन की विभिन्न अवस्थाओ में इसके अलग-अलग रंग देखने को मिलते है ... बचपन में पिता ही सबकुछ होते है.. बिलकुल एक सुपरहीरो के तरह, सर्वशक्तिमान  ...वो सब जानते है ...वो सब कर सकते है ...

किशोरावस्था में पिता हिटलर सरीखे नज़र आते है ... हम पर पैनी नज़र रखने वाले , हमेशा पढने के लिए कहने वाले , हमें हर बात पे टोकने वाले और गलती करने पर  प्रताड़ित करने वाले , इस समय अपने पिता हमें सबसे बुरे लगते है और मित्रों के पिता सबसे उम्दा नज़र आते है और मन में बार-बार एक ही ख्याल  आता --- काश ! हमारे पापा भी पिंटू के पापा की तरह होते ... देखो कैसे और कितनी  जल्दी उसकी हर मुराद पूरी करते रहते है ...

१८ साल के व्यस्क होते ही दोस्त ज्यादा प्रिय हो जाते है , पिता की हैसियत  एक पैसे देने वाली ATM मशीन सरीखी हो जाती है , उन जितना कम रूबरू हुआ जाए उतना अच्छा नहीं तो कपड़ो , आदतों , मित्रों , और दिनचर्या पे लम्बे-लम्बे व्याख्यान सुनने को मिलेंगे , पिताजी अगर एक  दरवाजे से कमरे के अन्दर  घुसते है  तो बेटा दूसरे दरवाजे से तुरंत बाहर कट लेता है , व्यर्थ के वाद-विवाद में कौन पड़े ? ... पिता  मज़बूरी की वजह से जरुरी  नज़र आने लगते है ... आंखिर उन पर अपनी सम्पूर्ण आर्थिक निर्भरता जो होती है ...

शादी के समय पिता सबसे ज्यादा जरुरी होते है , निर्णय लेने के लिए नहीं अपितु हमारे निर्णय को वहन करने के लिए और थोडी बहुत सामाजिक औपचारिकताओं के निर्वहन हेतु ...

संतान उत्पत्ति  के उपरांत उसके  पालन-पोषण आने वाली दिक्कते हमें पिता की असल अहमियत समझती है और हमें अपने पिता को एक नयी नज़र से देखने को बाध्य कर देती है , हम बार-बार ये सोचने में मजबूर हो जाते है कि हम से एक नहीं संभल रहा हम तीन-तीन भाई बहनों को माँ-पिताजी ने कैसे संभाला होगा ?

रोजी –रोटी की दौड़ में मसरूफ हम लोगों का बार-बार माँ-पिताजी से आग्रह रहता है के वो हमारे साथ आकर रहे , हमारे बच्चे दो-चार अच्छी बातें सीख लेंगे , उन्हें अच्छे संस्कार मिलेंगे और हमें सुकून कि  हमारे अनुपस्थिति में घर का कोई अपना बच्चो की देखभाल के लिए है ....पर अपने इस स्वार्थ में हम उनकी स्वतंत्रता को सीमित कर देते है और उन्हें मजबूर कर देते है के वो अपनी जड़ो से दूर इस तंग महानगरीय जीवन को जीयें जहाँ पास-पड़ोस के कोई मायने ही नहीं ...

बढ़ती जिंदगी अनेकों जटिलतायें  लेकर आती है , हमें अपने प्रभुत्व को दर्शाने के लिए हमेशा सबसे बेहतरीन ,अनावश्यक भौतिक साधनों की दरकार रहती है और इसके लिए एक आशा भरी नजर पिताजी की ओर ही लगी रहती है कि वो हमारी मदद करें जो अक्सर भाई- बहनों में आपसी  खीचतान का सबब बनती है ...पिताजी के इच्छा , मर्जी या चाह कोई मायने नहीं रखती उन्हें तो बस अपनी जरूरत बता दी जाती है और वो भी बड़े ही रूखे अंदाज़ में ...

पिताजी केवल आपकी जरूरत पूर्ति का साधन नहीं , उनकी भी एक अपनी जिंदगी और सोच है , जीवनभर संघर्षरत इस योद्धा को भी विश्राम और सुकून चाहिए, उनपे अपने निर्णय इस करके न थोपिए कि वो तो अपनी जिंदगी जी चुके और उम्र के इस पड़ाव में उनका दायित्व संतान की मदद के अलावा कुछ अन्य नहीं ...उनसे आग्रह करें नाकि भावुकता की चासनी में लिपटे हुए आदेश दें ...

बड़े –बूढ़े एक विशाल वट वृक्ष की भांति है जो अपने आश्रय से सबको जोड़े रखते है , जिनमें जीवन के अनुभव प्रचुर मात्रा मौजूद है जो अमूल्य है ... समय निकालिए उनसे बात करिये , संवाद की शक्ति को पहचानिए ,फ़ोन पे केवल हाल-चाल पूछने भर की औपचारिकताओं तक सीमित न रह जाईये  उनके पास भी बताने के लिये एक से एक बढ़कर  रोचक किस्से हैं जोकि आज तक उन्होंने आपको नहीं बतायें , मसलन उनका बचपन , उनकी पहली नौकरी , उनका पहला प्यार , उनकी हॉस्टल लाइफ , उनके सुट्टे का पहला कश यकीन मानिये आप बिलकुल भी बोर नहीं होंगे और आपको अपने एकदम से बिलकुल नए पापा के दर्शन होंगे...

याद रखें जैसा बोयेंगे आगे वैसा ही काटेंगे ... पिताजी हमेशा साथ नहीं रहने वाले और उम्र के इस पड़ाव पे सबसे बेहतरीन पे पहला  हक़ उनका है ...