Monday, 17 June 2013

मंदमोहन:-नीतीश सेकुलर, मोदी क्या हैं सारा देश जानता है


 10 जनपथ  मंदिर है ...
  माँ -बेटे  ही जिनके  भगवान ...
 सेक्युलर होने का सर्टिफिकेट बाँट रहे
 हमारे बिना रीढ़ वाले  प्रधान 
 जय हो ...जय हो ...जय हो 
 इसी तरह करते रहो भारत-निर्वाण 
***Candle  March ***

अब ये फैशन आम है
अभिजात्य वर्ग द्वारा
इस शाम भी
Candle March का प्रोग्राम है

मैचिंग कपडे ,चश्मे
और बैग के साथ
मेल खाती  मोमबत्ती का भी
इंतजाम है ...
Candle March का प्रोग्राम है


भीड़ जुटाने के लिए
नगद-नारायण  वितरण हेतु
मुकरर एक इंसान है
Candle March का प्रोग्राम है


मुद्दे से कहाँ मतलब ???
Page 3 और TRP का
ये खेल  खुल्लेआम  है
Candle March का प्रोग्राम है

जख्म किसी के
दिल में  है
और तस्वीर पर
मरहम  लगाने का ही सारा ताम-झाम है
Candle March का प्रोग्राम है


खुले में  रौशनी कर
दूर नहीं होते किसी के घर के अँधेरे
जलते घरो की आँच पर
अपनी  रोटियाँ  सेकने  की
ये नुमाईश सरे आम है

आज की शाम फिर से
Candle March का प्रोग्राम है ...


Sunday, 16 June 2013

इल्म की रौशनी
उन्हें  कमतर नज़र आती है
आँखों पे दौलत की
पट्टी जो है ...
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इल्म =ज्ञान (knowledge )


Saturday, 15 June 2013

माँ -पिताजी को आवश्यकता  नहीं
इस  so called Mother's/Father's Day पर
आपकी शुभकामनाओं  की

उन्हें तो साल भर  सिर्फ  आस   रहती है
आपके अच्छे व्यवहार और
उनके प्रति सही भावना की ....


Friday, 14 June 2013


लोहे के पेड़ हरे होंगे, 
तू गान प्रेम का गाता चल, 
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर, 
आँसू के कण बरसाता चल। 


सिसकियों और चीत्कारों से, 
जितना भी हो आकाश भरा, 
कंकालों क हो ढेर, 
खप्परों से चाहे हो पटी धरा । 

आशा के स्वर का भार, 
पवन को लेकिन, लेना ही होगा, 
जीवित सपनों के लिए मार्ग 
मुर्दों को देना ही होगा। 


रंगो के सातों घट उँड़ेल, 
यह अँधियारी रँग जायेगी, 
ऊषा को सत्य बनाने को 
जावक नभ पर छितराता चल। 

आदर्शों से आदर्श भिड़े, 
प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही। 
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है, 
धरती की किस्मत फूट रही। 


आवर्तों का है विषम जाल, 
निरुपाय बुद्धि चकराती है, 
विज्ञान-यान पर चढी हुई 
सभ्यता डूबने जाती है। 

जब-जब मस्तिष्क जयी होता, 
संसार ज्ञान से चलता है, 
शीतलता की है राह हृदय, 
तू यह संवाद सुनाता चल। 


सूरज है जग का बुझा-बुझा, 
चन्द्रमा मलिन-सा लगता है, 
सब की कोशिश बेकार हुई, 
आलोक न इनका जगता है, 

इन मलिन ग्रहों के प्राणों में 
कोई नवीन आभा भर दे, 
जादूगर! अपने दर्पण पर 
घिसकर इनको ताजा कर दे। 


दीपक के जलते प्राण, 
दिवाली तभी सुहावन होती है, 
रोशनी जगत् को देने को 
अपनी अस्थियाँ जलाता चल। 

क्या उन्हें देख विस्मित होना, 
जो हैं अलमस्त बहारों में, 
फूलों को जो हैं गूँथ रहे 
सोने-चाँदी के तारों में। 


मानवता का तू विप्र! 
गन्ध-छाया का आदि पुजारी है, 
वेदना-पुत्र! तू तो केवल 
जलने भर का अधिकारी है। 

ले बड़ी खुशी से उठा, 
सरोवर में जो हँसता चाँद मिले, 
दर्पण में रचकर फूल, 
मगर उस का भी मोल चुकाता चल। 


काया की कितनी धूम-धाम! 
दो रोज चमक बुझ जाती है; 
छाया पीती पीयुष, 
मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है । 

लेने दे जग को उसे, 
ताल पर जो कलहंस मचलता है, 
तेरा मराल जल के दर्पण 
में नीचे-नीचे चलता है। 


कनकाभ धूल झर जाएगी, 
वे रंग कभी उड़ जाएँगे, 
सौरभ है केवल सार, उसे 
तू सब के लिए जुगाता चल। 

क्या अपनी उन से होड़, 
अमरता की जिनको पहचान नहीं, 
छाया से परिचय नहीं, 
गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं? 


जो चतुर चाँद का रस निचोड़ 
प्यालों में ढाला करते हैं, 
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से 
जो इत्र निकाला करते हैं। 

ये भी जाएँगे कभी, मगर, 
आधी मनुष्यतावालों पर, 
जैसे मुसकाता आया है, 
वैसे अब भी मुसकाता चल। 


सभ्यता-अंग पर क्षत कराल, 
यह अर्थ-मानवों का बल है, 
हम रोकर भरते उसे, 
हमारी आँखों में गंगाजल है। 

शूली पर चढ़ा मसीहा को 
वे फूल नहीं समाते हैं 
हम शव को जीवित करने को 
छायापुर में ले जाते हैं। 


भींगी चाँदनियों में जीता, 
जो कठिन धूप में मरता है, 
उजियाली से पीड़ित नर के 
मन में गोधूलि बसाता चल। 

यह देख नयी लीला उनकी, 
फिर उनने बड़ा कमाल किया, 
गाँधी के लोहू से सारे, 
भारत-सागर को लाल किया। 


जो उठे राम, जो उठे कृष्ण, 
भारत की मिट्टी रोती है, 
क्या हुआ कि प्यारे गाँधी की 
यह लाश न जिन्दा होती है? 

तलवार मारती जिन्हें, 
बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती, 
जीवनी-शक्ति के अभिमानी! 
यह भी कमाल दिखलाता चल। 


धरती के भाग हरे होंगे, 
भारती अमृत बरसाएगी, 
दिन की कराल दाहकता पर 
चाँदनी सुशीतल छाएगी। 

ज्वालामुखियों के कण्ठों में 
कलकण्ठी का आसन होगा, 
जलदों से लदा गगन होगा, 
फूलों से भरा भुवन होगा। 


बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी, 
मूर्त्तियाँ एक दिन बोलेंगी, 
मुँह खोल-खोल सब के भीतर 
शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।

रचनाकार: रामधारी सिंह "दिनकर" 


असल में नरेन्द्र मोदी  एक उम्दा  किस्म के अनार है जो चाहने वालो को नहीं ....केवल उनसे घबराने वालो को ही बीमार करते है ...

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

***झाँसी की रानी की समाधि पर / सुभद्राकुमारी चौहान***