Friday, 5 July 2013

हमारी आवारगी से जलने वालो...

हमारी आवारगी से
जलने वालो...
हमको सिर्फ कमज़र्फ
समझने वालो...
हम पे बेवजह
तोहमते  मढने  वालो..

एक रोज
हमारे पास भी आओ
कुछ इस दिल की
मैकदे में साथ  बैठ
पैमाने तो  टकराओ

यकीनन तुम्हारे ख्यालात
बदल जायेंगे
जब घर की जानिब लौटते
दो जनाबो के कदम
एकसंग लड़खड़ाएंगे ...

Thursday, 4 July 2013

" पाखाना शायरी "पर आई आलोचनाओ पर ...

 " पाखाना शायरी "पर आई आलोचनाओ पर ...

मानता हूँ बॉस ...गुस्ताखी माफ़ ...हमेशा मूड एक सा नहीं रहता ...मगर पतित होकर उठने का आनंद ही कुछ और है ...अपना  दायरा बड़ा सा लगने लगता है ...

हम दल्ले है धर्मनिरपेक्षता के ये नामुराद कारीगिरी हमारी हमारी

सारे जहाँ से अच्छी                                                            
इशरत जहाँ हमारी
हम दल्ले है धर्मनिरपेक्षता के
ये नामुराद कारीगिरी हमारी हमारी

वोट बैंक सबसे ऊँचा
अल्पसंख्यको का हमारा
वो संतरी  हमारा
वो ही दिलाये मंत्री पद प्यारा प्यारा

कोठी में होती है
हमारी हज़ार चापलूसिया
इसके बिना नहीं होता
खाना हज़म हमारा हमारा

मजहबो को हम सिखाते
आपस में बैर करना
वैमनस्य फैला के ही
चमके नेतागिरी हमारी  हमारी

सारे जहाँ से अच्छी                                                            
इशरत जहाँ हमारी


ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तेरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई-बहादुर शाह जफ़र

ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तेरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई-बहादुर शाह जफ़र 
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ज़ुल्फ़ जो रुख़ पर तेरे ऐ मेहर-ए-तलअत खुल गई
हम को अपनी तीरा-रोज़ी की हक़ीक़त खुल गई.

क्या तमाशा है रग-ए-लैला में डूबा नीश्तर
फ़स्द-ए-मजनूँ बाइस-ए-जोश-ए-मोहब्बत खुल गई.

दिल का सौदा इक निगह पर है तेरी ठहरा हुआ
नर्ख़ तू क्या पूछता है अब तो क़ीमत खुल गई.

आईने को नाज़ था क्या अपने रू-ए-साफ़ पर
आँख ही पर देखते ही तेरी सूरत खुल गई.

थी असीरान-ए-क़फ़स को आरज़ू परवाज़ की
खुल गई खिड़की क़फ़स की क्या के क़िस्मत खुल गई.

तेरे आरिज़ पर हुआ आख़िर ग़ुबार-ए-ख़त नुमूद
खुल गई आईना-रू दिल की कुदूरत खुल गई.

बे-तकल्लुफ़ आए तुम खोले हुए बंद-ए-क़बा
अब गिरह दिल की हमारे फ़िल-हक़ीक़त खुल गई.

बाँधी ज़ाहिद ने तवक्कुल पर कमर सौ बार चुस्त
लेकिन आख़िर बाइस-ए-सुस्ती-ए-हिम्मत खुल गई.

खुलते खुलते रुक गए वो उन को तू ने ऐ 'ज़फ़र'
सच कहो किस आँख से देखा के चाहत खुल गई.



मेहर= सहानुभूति , तलअत =चेहरा, तीरा=अंधकार 
नीश्तर=निश्तर =चीरफाड़ का औजार या आला 
फस्द =नस को छेदकर शरीर का दूषित खून निकलने की प्रक्रिया, बाइस =कारण 
नर्ख =कीमत ,असीरान-ए-क़फ़स=कैदखाने के पुराने कैदी , कफ़स =पिंजरा , आरिज= गाल ,नुमूद =प्रकटीकरण,
कबा=लम्बा ढीला पहनावा , गिरह=गांठ ,जाहिद =जितेन्द्रिय , तवक्कुल =ईश्वर पर भरोसा रखना 



एक दफे रेलवे स्टेशन

एक दफे रेलवे स्टेशन
पे पढ़ा था
साफ सुस्पष्ट अक्षरों में
लिखा था

आपकी फैलाई गन्दगी
जिसे आप छूना भी
पसंद नहीं करते
छी कह   बिदकते
नाक पे कपडा रख
इधर-उधर सटकते

आप जैसे ही इंसान
मेहनत से  उसे साफ़ कर
अपनी जीविका के लिए
संघर्ष करते
कर्मठशील हो
अपने परिवार का पेट भरते

और आप खुद  को
बहुत बड़ा सभ्य समझते
उन के कार्य को तुच्छ जान
बार-बार फिर से
वही गलती करते ....
जरा सा  भी नहीं हिचकते

प्रतीत हो रहा   इस धरा पे
मनुष्य वेश में
अनगिनत पशु विचरते ....





भाई वाजिद अली शाह के जमाने के

भाई वाजिद अली शाह के जमाने के एक शायर ' चिरकिन ' का नाम सुना था .कहते हैं वो सिर्फ गू मूत आदि त्याज्य चीजों पे कहते थे .सूनी हुयी उनकी एक बानगी ............. ' चिरकिन ' चने के खेत में चिरको सरक सरक . रंगत अलग अलग हो ,खुशबू ( बदबू ? ) अलग अलग ...

मैंने खाई बाँसी रोटी

मैंने खाई बाँसी रोटी
और पीया
लहसुन-काले नमक वाला मट्ठा

मारा ऐसा पाद
पूरा class रह गया हक्का-बक्का ...

हवाओं में मूली  के परांठे लहरा रहे है
रसोई में बावर्ची नहीं
पैखाने में बाबूजी ही जोर लगा रहे है ...