Monday, 16 February 2015

बड़ा ही व्यथित हृदय लिए दोनों अलग अलग कमरों में सोने चले गए , छोटी सी  बात इतनी बड़ी बहस में तब्दील हो जाएगी ऐसा किसने सोचा था ? , दोनों अपने-अपने तर्कों पे अडिग... आरोप, प्रत्यारोप के बीच इस वाक-युद्ध में पूर्व के न जाने कितने गढ़े मुर्दे उखाड़े जा  चुके थे फिर उनको झाड़-पोछ कर आज के विवाद से जोड़  अपनी बात को वजन देने और अपने शोर को तर्कसंगत बनाने  की चेष्टा दोनों ने ही की थी .... क्रोध के आवेग में शालीनता के सारे बंध टूट चुके थे ये दोनों ही जानते थे पर उस  समय इसकी परवाह किसी को भी न थी....

बिस्तर पे करवट लेते हुए मै भुनभुना रहा था , हर बार ये ऐसा ही करती है, इस बार मै बिलकुल भी नहीं झुकूँगा चाहे जो हो जाये पर हर बार की तरह इस बार भी अन्दर से चिटकनी लगे दरवाजे पे उसके खटखटाने की चाह भी थी  .... समय धीरे-धीरे व्यतीत हो रहा था... क्रोध की विकराल  ज्वाला  अब  शांत हो चुकी थी  पर अहम् की अग्नि अभी भी  प्रज्जवलित थी.... विवाद का विच्छेदन मन ही मन आरंभ था , धीरे-धीरे पश्चाताप के साथ ग्लानि भी उत्पन्न  हो रही थी पर अहम् के समक्ष उनको तत्काल ख़ारिज भी कर दिया जा रहा था और इस उधेड़बुन में नींद न जाने कब आ गयी पता ही नहीं चला ...

सुबह उठा तो रात्रि के अनर्गल वार्तालाप से मन भारी था , अब अपनी गलती का अहसास अत्यधिक बलवती था, मन बहुत कुछ बोल रहा था पर पुरुष अहंकार के आगे लब हिलने को तैयार न थे , तभी चाय के प्याले के साथ सुप्रभात का स्वर सुनाई दिया , 08 बज चुके  थे पूनम सुबह घर के काफी काम निबटा चुकी थी ....

चाय की चुस्कियो के बीच दोनों के ही  नेत्र एक दूसरे से क्षमायाचना में मसरूफ थे ....

COFFEE IN MALL

मॉल में घुसते ही कॉफ़ी बनने  की मनमोहक महक नथुनों से टकराई  और बरबस ही  मुझे उस खुले में सजी दुकान  की ओर खीचती ले  गयी... जेब में मौजूद मूलभूत जरुरतो से अधिक पैसो ने इसके लिए अपनी स्वीकार्यता भी झट से प्रदान कर दी , हालांकि मै इस काले कसैले से पेय पदार्थ को पीने का कभी भी शौकीन नहीं रहा हूँ और सदैव ही अपनी अदरक वाली चाय को इससे ज्यादा तरजीह देता हूँ पर  ज्ञानेन्द्रियो के  तात्कालिक आकर्षण ने सोच और शौक पे पर्दा डाल  ही दिया ....

मेनू देख एक जद्दोजेहद प्रारंभ हुई , एक अदनी सी  कॉफ़ी के इतने दाम ?? इससे कम  में तो अपने हाथ से घुटी हुई, अच्छे ताजे दूध की बनी  कॉफ़ी, एक  दर्जन लोगों को घर के सुकून भरे वातावरण में आराम से पिला सकता हूँ ... पर जेबों में भरे पैसे की गर्मी ने इसको तत्काल ख़ारिज भी कर दिया  .. अमां कंजूसी छोड़ो , कमा किस लिए रहे हो ??? एक –आध दफे ऐसी  फिजूलखर्ची जायज है ...

खैर यदा-कदा मैदे में तेजाबियत की तकलीफ से जूझने वाले इस शख्स ने वहां मौजूद वेटर को ज्यादा स्ट्रोंग न होने की हिदायत के साथ एक काफी का आर्डर दे ही डाला , काफी आने में समय था और नजरे आस पास के माहौल का जायजा लेने लगी , बड़ी शालीनता से बैठी, हाव-भाव और परिधानों से  अभिजात्य वर्ग की लगनी वाली, उम्र के तीसरे दसक की एक महिला अंग्रेजी का  उपन्यास पढने में मशगूल थी , कॉफ़ी पी चुकी थी या पीने वाली थी पता नहीं पर उसके चेहरे में तल्लीनता  का भाव देखने लायक था , ऐसा लगा वो इस वातावरण की काफी अभ्यस्त सी है और उसके लिए यहाँ बैठना  रोज की ही आदतों में शुमार है, व्यक्तिगत पठन इतनी सहजता की साथ सार्वजानिक भी हो सकता है यह बात मेरे मन में थोड़ी बहुत शंका उत्पन्न कर रही थी ....

बगल में बैठा अभी- अभी नव यौवन में प्रवेश पाया के एक जोड़ा अपनी चुहलबाजी  में व्यस्त था , कॉफ़ी के साथ खाने पीने की चीज़े उनकी सामने की मेज पे शोभा पा रही थी  , मोबाइल पे एक दूसरे को कुछ दिखाते हुए हंसी मजाक हो रही  थी, तभी उन से  उन्ही के  हमउम्र दो  साथी और जुड़ गए  , कुछ खाने पीने के आग्रह हुए और उनके न नुकुर के साथ ही सभी तुरंत उठ खड़े होकर बाहर चल दिए और पीछे मेज पे रह गया बरबादी का एक मंजर , आधे अधूरे खाए हुए चाकलेट डोनट  चकाचौंध से गुलजार इस मॉल के बाहर अभिशप्त मांगने वालों को मुंह चिड़ा रहे थे, पैटीज के बाहर निकले और बिखरे आलू और बेकद्री से तोड़े गए सैंडविच के टुकड़े उनकी भूख का उपहास उड़ा रहे थे .... सम्पन्नता अपनी धुन में मस्त, कितनी बेखबर थी  , किसी के अभावो से उसे सरोकार रहा भी कब है ?

तभी बगल की कुर्सी पे विराजमान मोटे चेकों का घुटन्ना और लाल टी-शर्ट पहने एक चश्मीश युवक पे नज़र पडी , बाल बिखरे हुए और पैरो पे चप्पल... ऐसा लगा सुबह सुबह बिस्तर से उठ के सीधे यहाँ चले आ रहे हो , कानों में मोबाइल के ईअरफोन खोसे , एप्पल के  चमकदार सफ़ेद लैपटॉप पे उँगलियाँ फिराते हुए वो ब्लैक कॉफ़ी का आनंद ले रहे थे ... परिधानों और उपकरणों से अंजानो को आमंत्रण सा  देते  वैभव की खुल्लम-खुल्ला नुमाईश  ... और मुझे था उसे  देख कितनी जलन का अहसास .... उसकी उम्र में हम अपने भविष्य के लिए कितने संघर्षरत थे ...

खैर मन में उठते विचारों के इन भंवरो  और अनजान लोगों के अपनी नजरों से होते इस आंकलन के बीच हमारी कॉफ़ी  आ ही गयी ... सफ़ेद चीनी-मिट्टी के प्लेट  के ऊपर विराजमान कप में क्रीम के द्वारा बनी फूल की आकृति ने मन मोह ही लिया , चम्मच से हिलाने  चीनी मिलाने और चम्मच से हिलाने पे   ये खंडित हो जाएगी इसका अफ़सोस भी हुआ ....

गरम गरम कॉफ़ी मै अपने  हलक से उतार रहा था  ,  कॉफ़ी अच्छी बनी थी  पर मन पता नहीं क्यों यारों के साथ कॉलेज गेट पे बेफिक्री के साथ पी गयी सुन्दर की चाय के स्वाद को इसमें तलाश रहा था ?

Saturday, 31 January 2015

खाली बैठे वो
कितने मेहनतकश से
और काम करते हम
कितने कामचोर कहलायें

चुप बैठे वो
कितने बोलते से
और हम बोले तो
सिर्फ शोर ही मचायें

निर्णय न देकर भी वो
कितने निर्णायक 
और इंतजार में झल्लाते हम
विद्रोही होने का तमगा पायें...
सुबह तडके ही सवा  पांच बजे उठ गया , यद्यपि रात को हमेशा की तरह साढ़े पांच का अलार्म लगा दिया था पर जल्दी  उठने की चिंता स्टील की मेज घड़ी से हर बार की तरह इस बार भी  जीत ही गयी और आज भी मुझे गरम रजाई के पाश से मुक्त करने का कलंकित श्रेय उसे ही मिला ....

बूबू (दादाजी  ) हमेशा ही कहते “सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्” और कितनी कडवी लगती है  यह बात पर इसके अलावा कोई अन्य चारा है  क्या ? दसवी जमात  में आते ही मानो कर्फ्यू लग गया हो , अब कितनी चीजे निषेध है,  ऊपर से रही सही कसर बड़े भईया पूरी कर गए  , उनकी मेहनत की  मिसाले दे देकर घर वालो ने जीना मुहाल कर रखा है ... वाद विवाद और डांट-डपट से बचने के लिए न चाहते हुए  भी वो ही रास्ता तय करना है  जो वो दिखा के गए  , यदा कदा  हमारी तरफ से विरोध के स्वर उठते है  पर पिताजी के कड़े अनुशासन के समक्ष वो ज्यादा देर तक बुलंद न हो पाते ...

दिसम्बर की यह सर्द भोर , भीषण ठण्ड के मध्य बाहर अभी अँधेरा है  , मुहल्ले में भी शांति ही है ,बगल के घर गुर्रानी जी को सुबह फैक्ट्री  जल्द जाना होता है ,इसलिए उनकी घर की रसोई से बर्तनों के खडकने की आवाज़े आ रही है , तभी साइकिल की तेज घंटी की आवाज इस सन्नाटे को जितनी  तेजी से चीरती हुई आई और एक थप्प के साथ उसी तेजी के  साथ गायब भी हो गयी , लगता है अखबार आ चुका है इसके प्रतिक्रिया स्वरुप अब कई घरो के बाहर वाले जालीदार  दरवाजो के खुलने में  जोर से खीचने की ची और स्वत् बंद होने की धडाम के स्वर सुनायी  देने लगी है , धीरे-धीरे शोर बढ़ रहा है ,लोहे के गेटों के खुलने बंद होने की चिर-परचित धातुमय धव्नियां स्पष्ट सन्देश दे रही है कि अमुक घर का भी कोई न कोई व्यक्ति  जाग चुका है...

जल्दी जल्दी गुसलखाने में घुस ब्रुश से दन्त साफ़ करने की औपचारिकता  निभा रहा हूँ , मंजन की समतल टयूब का  गले तक जोर से मर्दन करने पश्चात  भी  मटर के दाने बराबर पेस्ट निकल पाया , चलो फिलहाल इसी से  काम चलाओ कल इसको काट कर आज से बेहतर नतीजे निकालेंगे,  टंकी का पाने एकदम बर्फीला है , न तो गर्म करने का समय है और ना ही सुविधाजनक साधन , सी सी करते हुए , मुख और नथुनों से निकलती दृश्य भांप के मध्य ठन्डे पानी का यह सितम झेल ही लिया है , कुल्ला हो चुका है , चेहरा धुल  चुका है , आखों के  गीदड़ के सफाई शायद पूर्ण नहीं हो पाई है,  वो तो किसी के टोकने तक जारी रहने वाली है....

मेरी हौंसला अफजाई के लिए माँ भी जग चुकी है , और मेरे हाथ में पकड़ा गयी है , कम दूध की कालीमिर्च युक्त तेज चीनी  वाली चाय का गिलास जिससे मै अपने हाथो को  सेक रहा हूँ  और पीते-पीते ही टयूशन का रजिस्टर खोज रहा हूँ , मेरे इस रूखे गले को कितना तर कर रही है यह ममतामयी चाय , सुबह-सुबह इस समय कुछ खाने का सवाल ही नहीं पर माँ की तो आदत है ना  पूछने की और हमारी झल्लाने की ...

साइकिल उठा चल पड़े है नफीस  मास्साब के घर,  हिसाब के सवालों से जूझने, उनके उत्तरों को खोजने के संघर्ष में अपना भविष्य संवारने ....
लड़के भी केवल दो प्रकार के ही होते है , पहले बुरे और दूसरे बहुत बुरे। लड़कों की फितरत है ही ऐसी  कि वो अच्छे हो ही नहीं सकते इसलिए "अच्छा लड़का " एक कोरी कल्पना से ज्यादा कुछ भी नहीं...

बुरे लड़के वाकई में बुरे होते है पर बहुत बुरे लडको थोडा कम...ये अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते , "अपना काम बनता भाड़ में जाये जनता " कहावत की उद्गम स्थली ये ही लोग है , फोकस में रहने के लिए ये कुछ भी कर सकते है , निहायत ही मतलब परस्त .... 

इनकी चेहरे की मासूमियत से आप हमेशा ही धोखा खायेंगे , साफ-सुथरे और मूंछ मुंडे , कमीज करीने से पतलून के भीतर खोसी हुई , पतली काले रंग की  चमड़े की बेल्ट , बेल्ट का बक्खल भी छोटा और डल्ल स्टील फिनिश का, अगर पेंट पहनेगें तो उसके साथ स्पोर्ट्स शूज कभी नहीं , हमेशा चमड़े के पॉलिश किये हुए जूते, जीन्स के साथ कोई भी जूता चल सकता है , हाथ पैर के नाख़ून करीने से नेल कटर द्वारा  एकसार  कटे हुए, व्यक्तिगत स्वच्छता का पूरा ख्याल, साफ़ सुथरे ब्रांडेड अंडरवियर और बनियान पहनने वाले....सर के बाल  छोटे पढ़ीस लुक में कटे हुए  , छोटी छोटी  कलमे  और दाढ़ी हमेशा बनी हुई  , ओल्ड स्पाइस की भीनी-भीनी  खुशबू इधर-उधर बिखेरते हुए ...

अतंत ही मृदु भाषी ...संयत,  सीमित और परिष्कृत  वार्तालाप , शब्द बड़े  ही नपे-तुले और सोच समझ के बोले हुए, जब किसे से मुखातिब हो तो विद्वता झलकती हुई और मुखतलिफ रहने में कितना ठहराव ...
अपने कार्य के प्रति समर्पित , भविष्य के लिए योजनाबद्ध , फालतू वक्त बरबाद करने की जरा भी आदत नहीं, अनेक जटिल समीकरणों के एक साथ हाल करने  में दक्ष , निहायत ही मेहनती , नित्य नवीन उपलब्धियों को अर्जित कर कीर्तिमान स्थापित करने वाले .... अनेकों से व्यक्तिगत सम्बन्ध पर स्वार्थ की परिधि के बाहर कोई भी नहीं ....
जीवन का हर कदम  सोचा समझा और परखा हुआ ....लोगो की प्रशंसा से मुग्ध  और ऐसा ही ही हमेशा चाहने वाले पर किसी निरीह  को ख़ारिज करने में जरा भी विलम्ब न करने वाले भी ... बहुत अच्छी लडकियों में  कितनी ख्याति प्राप्त ये बुरे लड़के ....

इसके विपरीत अपने मस्ती में खोये कुछ बहुत ही  बुरे लड़के... बड़े बाल , बड़ी दाढ़ी, मैली-कुचैली जींस ...टी-शर्ट या शर्ट हमेशा बाहर , नाख़ून ब्लेड से कटे  या मुंह से कुतरे  कुछ बड़े बड़े उबड़-खाबड़ से , पैर के अंगूठे का नाख़ून इतना बड़ा के जुराबों को फाड़ अपनी विकरालता का अहसास दिलाता हुआ , गंदे से स्पोर्ट्स शूज ,काले मैल की एक मोटी सी परत लिए हुए , नाक से एन्टीना की भांति निकले हुए बाल जो कभी कभार मूडे से भी सु-सज्जित , सर में बड़े बिखरे बालो के मध्य रुसी के मोटे पहाड़ जो किसी शैम्पू से नहीं, खरोजने से ही स्थूल रूप में  बाहर आते हुए , कान की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों गन्दगी के  कारण बने अवरोध जो साबुन से न जाने कब से स्पर्श न हों पाने की व्यथा को व्यक्त करते हुए... हाथ की छोटी अंगुली से ही अपने उन्मूलन की बाट जोहे  ,  छेद युक्त अधोवस्त्र (अंडरवियर और बनियान) जो तार पे लटकने पर ही अपनी लाचारी को बयां कर पाते , इनका टूथ ब्रुश घिस-घिस के फूल की आकृति लिए अपने नए नामकरण को कितने दिवसों से  प्रतीक्षित ...

चाल ढाल और वार्तालाप सब कुछ कितना स्थूल कितना व्यापक, नजाकत और नफासत से कोसो दूर ,शब्द नहीं मानो मुख से पत्थर बरस रहे हो .... खुद की इनको चिंता कहाँ ??? हर किसी के फटे में टांग अडाने वाले, दुनियादारी के चक्कर में खुद को भूल , मतलबो से दूर सिर्फ मतलब भर की पढाई करने वाले ये मैपरस्त...

दोस्तों की  लम्बी कभी न खत्म होने वाली फेहरिस्त , संबंधो में  हर किसी से एक अनूठे, अपनेपन  का अहसास, हर मिलने वाले से  गर्मजोशी और दिल से स्वागत सत्कार , ये वर्तमान में जीने वाले भविष्य की तमाम चिन्ताओ और जोड़-घटा,गुणा-भाग से कितने दूर कितने परे... 

इनका दर हमेशा खुला हुआ, इनकी सारी चीजी सबकी और सबकी सारी चीजे गाली के साथ इनकी, मेरा तेरा का कोई भेद नहीं, कोई प्रतिद्वंदी नही सारे वाद-विवाद और ऊँच-नीच को भुला सभी मित्र ,पढाई छोड़ गली कुत्ते से लेकर मंगल गृह की चिंता का भार इन्ही  कंधो पे .....वाकई बहुत बुरे लड़के बहुत ही बुरे  होते है खासकर अपने लिए.....

Thursday, 29 January 2015

लडकियाँ दो प्रकार की ही होती है , एक अच्छी और दूसरी बहुत अच्छी , गन्दी या बुरी लड़की मन का भ्रम है, हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है इसलिए कोई भी यह भ्रांति न पाले ....
अच्छी लडकियाँ वाकई में अच्छी होती है , बहुत अच्छी लड़कियों से कुछ ही मामलों में उन्नीस ... एक दम सीधी सादी , नाक की सीध में चलने वाली ,अपने काम से काम रखने वाली, अपने परिधानों में कोई विशेष ध्यान न देने वाली, जो मिल गया वो पहन लिया टाइप्स , कपड़ो से मेल खाते वेशभूषा के अन्य अवयवो के आपसी मिलान में इनकी कोई विशेष रूचि नहीं होती .... अधिकतर हिंदी माध्यम से पढी हुई ये बालायें थोड़ी संकोची स्वाभाव की होती है , लड़को से बात तो करना चाहती है पर झिझक के कारण नहीं कर पाती है, ये लड़कियों के बीच ही सहज होती है और आप सब की कल्पना से भी ज्यादा मुखर , यहीं इनकी दबी हुई प्रतिभायें अपना मूर्त रूप ले अन्य सभी सखी सहेलियों को अचंभित कर देती है ....
इनका बचपन वंचित तो नहीं पर बहुत ज्यादा विलासी भी नहीं होता , इसलिए बचत की आदत शुरू से ही पड़ जाती है , १२वी कक्षा तक माँ-पिता भाई का संरक्षण में रहने वाली जब ये पहली बार घर से दूर हॉस्टल पहुँचती है तो रोजमर्रा के कार्यो में काफी कठनाईयों का सामना करती है पर गलतियाँ कर देर-सबेर ये सबकुछ सीख ही लेती हैं ,
बिना घरवालों की रजामंदी के कोई भी कार्य नहीं करती चाहे वो मैगी का पैकेट खरीदना हो या फिर शादी , मन के अन्दर बहुत कुछ चलता रहता है पर वो अपने तक ही सीमित रहता है , मित्र कम ही होते पर उनपर निर्भरता ज्यादा होती है और बहुत परेशान होने पर उनसे ही बातें साँझा करती है ... कुछ ही सारी की सारी नहीं .
इनका स्वयं को छोड़ अन्य कोई प्रतिद्वंदी नहीं होता क्योंकि इनका अधिकांश समय खुद से ही जूझते रहने में व्यतीत होता है .... खुद की कोसाई ही इनकी सबसे बड़ी कमी होती है अक्सर उसी में लिप्त रहते हुए ये अपनी अच्छाईयों को भूल जाती है ...
इनकी झिझक, इनका डर , इनका असहजपन अक्सर इनके गुस्से के रूप में प्रकट होता है जो वास्तिविकता से परे इनके जिद्दी ,अड़ियल और असामाजिक होने का भ्रम पैदा करता है .... इनके अत्यंत निकट रहने वाले ही इस बात को बेहतर तरीके से जान सकते है...
खुद अपने काम पे यकीं रखने वाली ये मोहतरमायें किसी से भी अनावश्यक मदद की दरकार नहीं रखती और एकला चलो पे ही विशवास रखती है ...
बहुत अच्छी लड़कियां वाकई गजब की होती है , किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि ,शिक्षा , शहर से इनका कोई वास्ता नहीं, खुद ईश्वर द्वारा नवाजी गई ये कहीं भी मिल सकती है .... सभी लोग इनके मुरीद होते है और इनके तमाम यत्न-प्रयत्न ,कोशिशे भी अपनी लोकप्रियता को ही अक्षुण्ण बनाये रखने की होती है ....
सिर के बालो लगे रुफ्फ्ल हेयर बैंड से लेकर पैरो की सबसे छोटी के कन की अंगुली के नाख़ून में लगी नेल पॉलिश तक सबकुछ सटीक रूप से मिलान किया हुआ होता है .... ये शुरू से ही आत्मनिर्भर होती है , अपने को किसी मामलो में लड़को से कम नहीं समझती और समझे भी क्यों उन से दो कदम आगे ही होती है ....
उपलब्ध संसाधनों का पूरा का पूरा उपयोग अपने हित में कैसे होता है ये कोई इनसे सीखे , अपना काम करवाने में माहिर, इनके मोहनी इंद्रजाल में फंसे लड़के इनके हुक्म की तामील में दौड़ते ही रहते है , कॉलेज के प्रोफेसर भी इनके मोहपाश में बंधे कितनी लार टपकते है और परीक्षाओं में उत्तर न आने की स्थिति में मुस्कान ही इनका सबसे कारगर अस्त्र होता है जो कभी विफल नहीं जाता ...
इनके लिए जीवन में सबकुछ पहले सी तय होता हो , किस लड़के को मजदूर बना के काम करवाना है , किस को साथ में टहलाना है , किस से इमोशनल सपोर्ट चाहिए और किस को भईया बना के सुरक्षा पानी है बस तय नहीं होता तो वो है जीवन साथी , परफेक्ट पार्टनर की खोज सदैंव ही जारी रहती है और मौके पे ही चौका लगाया जाता है , जीवन में स्थायत्व को रंग रूप और शारीरिक गठन से सदैव ही ज्यादा तरजीह दी जाती है ....असंवेदनशील तो नहीं पर ज्यादा इमोशनल भी नहीं .... बहुत प्रैक्टिकल होती है, विपरीत हवाओं के रुख को भी अपने पक्ष में मोड़ने में सिद्धहस्त....
लोकप्रिय होने के कारण सबसे मेल-मिलाप रहता है, जानी -दुश्मनी तो किसी से नहीं पर इनके अन्दर असुरक्षा का भाव बहुत ही ज्यादा होता है खासकर अपनी तरह की दूसरी बहुत अच्छी लड़की से जो अक्सर विवाद की शक्ल भी ले लेता है ...खुद को सांत्वना देने और ढाढ़स बंधाने के लिए खूब निंदा रस का सेवन किया और करवाया जाता है ...
सफल रहना ही पहली प्राथमिकता होती है इसलिए साथी प्रतिद्वंदी सरीखे नज़र आते है , मित्रता तो होती है पर घनिष्ठता नहीं, खुद के बेहतर साबित करने की होड़ में अक्सर सम्बन्ध पीछे छूट जाते है ... इनके बहुत से क्रियाकालाप बहुत ही नपेतुले और गुपचुप तरीके से होते है , खुद के आलावा ये किसी अन्य पे भरोसा रखने नहीं करती ..... अपने आभामंडल से उत्पन्न भीड़ की ये आदि सी हो जाती है और आगे चलकर ये ही उनकी सबसे बड़ी विवशता भी बनता जो अक्सर उनके कार्यों, आचरण और निर्णयों को प्रभावित करता है ....

Tuesday, 27 January 2015

रात के एक बजे , जोशी के डबल कैसेट टेपरिकॉर्डर पर किशोर दा का स्वरबद्ध ओ हंसनीचल रहा , भारती अपने मुहं में मंजन से उत्पन्न झाग को समेटते हुए कुछ कहने की कोशिश कर रहा है ,सैंडी हाथ में साबुनदानी उठाये हमेशा की तरह पैखाने की ओर अग्रसर है , राममोहन धूम्रदंडिका ओष्ठो में दबाये अपने फेफड़ो को फूंक रहा है , नीचे की ग्राउंड फ्लोर में यदा कदा दोपहिया वाहनों के चलने और रुकने उनके स्टैंड से उतरने और चढ़ने का शोर सुनायी दे जाता है , बॉयज हॉस्टल -२ के सबसे उपरी मंजिंल का यह बरांडा  हमेशा की तरह इस समय भी गुलजार है , एक सौ वाट के  बल्ब ने अर्धरात्रि  के इस कठोर   तिमिर से जूझने का संकल्प उठाया हुआ है , कमरों के दरवाजो और खिडकियों से आता हुआ टयूब लाइट का सफ़ेद दुधिया प्रकाश उसके इस संघर्ष में उसे कितनी सहायता प्रदान कर रहा है .... जाट राम बरगोटी बाबू  सुबह जल्द उठने के फेर में  सोने जा चुके हैं  पर उनकी आँखों में नींद कहाँ ??? कान तो हमारी ओर ही लगे हुए हैं ....

 जाड़े की भीषणता अब समाप्त सी  हैजनवरी के इन अंत के दिनों में मेरे कमरे में सप्ताहांत की यह  रात दो ईंटो के ऊपर रखी हीटर की सफ़ेद प्लेट में सुर्ख लाल हुए फिलामेंट से निकलती  ऊष्मा से ऊर्जा पा यहाँ  विद्यमान हम सभी वाचाल वाचको को ऊर्जित कर रही है ... BC (बातचीत ) अपने चरम पे है ,समय का कोई बंधन नहीं , कक्ष सहयोगी लखनऊ वाला है अक्सर ,शनिवार-इतवार को घर चला जाता है इसलिए टोका टोकी से परे कमरे में पूर्ण रूप से मेरा ही अधिपत्य है .... मेहमान नवाजी अपने पूर्ण शबाब पे है , कमरे के बिखरने , चद्दर  के गन्दा होने ,सामान की छेड़छाड़ की तनिक भी चिंता नहीं ....
रावतपुर से शाम को ही एक किलो मूंगफली ले आया था , हरे धनिये ,मिर्च ,लहसुन की तीखी चटनी और भुकनु के साथ , यद्यपि बचपन से गुड या रेवड़ी के साथ मूंगफली खाने की आदत रही है पर जहाँ पिछले दो सालो में घर से हॉस्टल आने के बाद  जब आपका पूर्ण कायांतरण हो चुका हो तो मीठे और नमकीन का यह तुच्छ भेद क्या चीज है ?.... एक कुमाऊँनी अब विशुद्ध रूप से  पक्का कनपुरिया बन चुका है ...यहाँ के स्वाद और बात के  समस्त कायदों को सीख...

कमरे की उन निवाड़ वाली  चारपाईयो के मध्य छिलको के लिए प्लास्टिक की  बाल्टी रख ली गयी है ,स्टडी टेबल से किताबो को हटा उसे भी बाल्टी के बगल में रख लिया  गया है , उसके ऊपर मूंगफली एक बड़ी सी प्लास्टिक की  थैली में, कागज में रखी हरी चटनी और भुकनु  के साथ शोभायमान हैऔर सब के सब इस खाद्य सामग्री पे टूटे पड़े है ...मूंगफली छिलने की चटर-पटर बातों की चटर-पटर के साथ निर्बाध गति  से आगे बढ़ रही है , समय के साथ लोग जुड़ते चले जा रहे है पर जो एक बार आ गया उसे जाने की सुध कहाँ ??? बातों की इस चाशनी में कितना चुम्बकीय आकर्षण है ....

तकरीबन  ९०% विषय    एक ही है बस उसे अलग अलग आयामों और निंदा रस  से सराबोर करके प्रस्तुत किया जा रहा है ....आज चर्चा का केंद्र बिंदु बत्रा बाबूका सेंटीयापा है और वो हम सभी के गले रूपी तरकश से निकले  शब्द बाणों को झेल रहें है अपने लम्बे लम्बे स्पष्टीकरणों की ढाल के साथ ... जब कभी अति हो जाती है तो पैर पटक के जाने लगते हैं पर मन-मनौव्वल और topic change  करने के वादो के साथ उनको वापस बुला ही लिया जाता है ...किन्तु लोग कहाँ मानने वाले ??? आज का "SOFT TARGET" वो ही हैं ... घूम फिर के बात उन्ही के सिर पे आ  जाती है ...

तभी एकाएक  कालू  को कुछ चुल्ल मची वो भाग के अपने कमरे में जाकर अपने पॉवर हाउस में “summer of 69जोर से लगा देता है , पर हम अधिकांश देसी  बालको को इस संगीत की समझ कहाँ??? शोर को तुरंत बंद करा दिया जाता है , बहुमत के आगे कालू भी विवश है और हमें गंवार होने का तंज के साथ वो बड़े ही बेमन से झल्लाते हुए सीधे पॉवर स्विच ही ऑफ कर देता है ...बातों का प्रतिकार जारी है ...सब के अपने अपने तर्क है और अपनी अपनी सोच ...

मूंगफली ख़तम हो चुकी है पर बातें नहीं  ....बाल्टी होने के बावजूद भी छिलके कमरे में यत्र तत्र सर्वत्र बिखरे हुए हैं , दानों के ऊपर मौजूद रहने वाले महीन लाल रंग के छिक्कल अस्तित्व विहीन से रजाई,चद्दर  और गरम जर्सी से मजबूती से चिपक गए है शायद किसी शरण की तलाश में...


बिना सुरापान वाली ये रात भी गजब की रही , आगे आने वाले दिनों की कार्यवाही का मसौदा तैयार कर लिया गया ... दूर दूर तक परीक्षाओं की कालिमा फिलहाल नहीं है और हम सब  निकल चुके है गेट पे  सुन्दर की चाय पीने .... मस्त जिंदगी का एक और मस्त दिन बीत गया...  आने वाली और मस्तियों की  योजना के साथ...