Tuesday, 7 January 2014

वो तकलीफ पे तकलीफ़ देते गए
हम मज़े से हँस -हँस के सहते गए 
वो हताश हुए
हम और भी बिंदास हुए.…






Sunday, 5 January 2014

बहुत हो चुका काम
चलो घर चले.…

सुबह से हो गई है शाम
चलो घर चले। …

जिस्म को  दे आराम
चलो घर चले.…

सुकून मिले , जान में आये जान
चलो घर चले। …

आज नहीं क्या इतेज़ाम ???
चलो घर  चले ???

पर बहुत हो चुके बदनाम
चलो घर ही  चले

मैकदे में साक़ी  हम से परेशान
चलो घर चले

पर घर में मयस्सर नहीं जाम
तो क्यों घर चले ??

न पूरे होंगे अरमां
फिर क्यों घर चले …

छोड़ो अब नफे -नुक्सान
जिधर कहो उधर चले

डूबने में जहाँ मिले इत्मीनान
चलो वहीँ चले.…

महफ़िले अब हम से है जवान
चलो मैकदे चले

रिन्दों को माफिक नहीं और कोई काम
चलो  मैकदे  ही चले …












Tuesday, 31 December 2013

वक्त फिर से बे-वफाई कर गया
देखो कितनी जल्दी फिर से साल बदल गया

कुछ मिला तो कुछ रह गया अधूरा
जिंदगी है चलता रहेगा ये सिलसिला

फुर्सत निकालिए
अपनों के और करीब आते रहिये

साल तो आते-जाते रहेंगे
किसी न किसी बहाने
खुशियाँ मनाते रहिये ....


Monday, 11 November 2013

उन्हें हमारे शौक से  शिकवा
हम उनकी बेजा फिक्र से नाराज 
हम  कभी-कभार  शौकिया  मैपरस्त
उनके हमेशा  उखड़े -उखड़े अंदाज़
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मैपरस्त=शराबी







Saturday, 9 November 2013

हर रोज झाड़ा, पटका ,धोया और रगड़ दिया
पति था कपड़ा नहीं , तभी इतने साल चल गया

Friday, 8 November 2013

अपनी बस यही हालत है.

तुम्हे पाने के ख्वाब कैसे देखे ?
अपनी तो नींद ही नदारद है
तुम से मिलने के बाद
अपनी बस  यही हालत है.…


Thursday, 7 November 2013

झाड़ पे ऊँचा चढ़ा  गए
उनसे आशिकी के  ख्वाब दिखा गए 
दोस्त साले कमीने थे
बस सुपुर्द-ए -खाक करवा गए