Friday, 30 March 2018

पिताजी हॉस्टल आये ...

पोटली में बाँध 
कुछ सामान लिए 
पिताजी घर से चले आये 
माँ का स्नेह साथ पिरो लाये ...

भेजे हैं माँ ने 
अपने चुन्नु के लिए 
कुछ बेसन के लडडू
कुछ मठरी और चने का सत्तू

लल्ला दूर पढ़ रहा है 
माँ को ये विछोह 
कितना अखर रहा 
पता नहीं क्या खाता होगा 
पेट भी अच्छी तरह कहाँ 
भर पाता होगा ...

कितने लाड प्यार में 
देखो ये पला है 
खाने में कितना 
न –नुकुर इसने किया है

कलेजा का टुकड़ा 
परदेस में मेहनत कर रहा है 
परिवार को तारने के 
कितने ख्वाब बुन रहा है

पोटली खुलते ही 
फ़ैल गयी चारो ओर महक 
आस-पास का संगी साथी 
करे पिताजी को चरणस्पर्श

सब देखों खाने में रमे है 
महीने भर की सामग्री 
मिनटों में चट कर दिए है

ये देख पिताजी फूले नहीं समाते 
अपने संघर्षो को फलीभूत होता देख 
देखो कितना हर्षाते ...

Wednesday, 14 March 2018

किस्सा -ए-पुताई

किस्सा -ए-पुताई

BH-3 में रंग-रोगन का काम चालू था , आज पुताई सबसे ऊपर की मंजिल में बॉस के कमरे में होनी थी , पुताईवाले के बार-बार आग्रह ,अनुनय और विनती से द्रवित हो बॉस ने आंखिरकार कमरा खाली कर ही दिया , खुद नहीं किया , इतनी जहमत कौन मोल ले? .... पुताईवाले से ही कराया ...

सरकारी खर्चे पे काम कैसा होता है , ये हम सभी जानते ही है .....
पुताई वाले ने तीन चार , आड़े-तिरछे ब्रुश मारे और हो गया काम से फ़ारिग...बॉस में जब अपने कमरे को देखा तो बोले “ बेटा कल एक और कोट मर देना ... मजा नहीं आया ...

डॉक्टर साहब के आदेश की अवेहलना नहीं की जा सकती थी और इन वाले बॉस की तो कदापि भी नहीं ... अगले दिन कमरे में दूसरी दफे फिर से पुताई का काम चालू था ... इस बार थोड़ी अतिरिक्त संजीदिगी के साथ ..

फिर से शाम को कमरे का मुआयना हुआ ... मसाला लगे दांतों को माचिस की तिल्ली से खुजलाते हुए बॉस बोल उठे .... अम्मा यार ... मजा नहीं आया ... कमरे में दिल को खुश करने वाली चमक नहीं ... ऐसा करना बेटा कल फिर से एक कोट मार देना ... छत का ध्यान राखियों ... एक दम दूध जैसी सफ़ेद लगनी चाहिए ....

पेंटर बाबू के थोड़ी असहजता महसूस हुई , अपने मापदंड के अनुसार वो अपने काम को बखूबी निभा चुके थे...वो भी एक ही काम को दो बार ... खैर पानी में रहकर मगर से बैर तो लिया नही जा सकता था ... सो भरे मन से ही सही अगले दिन भी, तीसरी बार पुताई वाले की कूंची से उत्पन्न छीटों से बॉस के कक्ष का फर्श गुलज़ार था ...

शाम को थके मांदे पुताई वाले ने थोडा अधीर होते हुए पूछा” साहब अब तो हो गया ... स्वर थोडा तल्ख़ और कर्कश था ....

पुताई वाले की उदंडता को भांपते हुए बॉस बोले ... ससुर तुम कोई काम ठीक से नहीं कर सकते ... तीन –तीन बार हाथ चला चुके हो और नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात ... कल फिर आ जाना , ये आंखिर बार है अगर इस बार भी कमरा ठीक से नहीं पुता तो तेरी खैर नहीं ...

पुताई वाले का सब्र का बाँध अब टूट चूका था , प्रतिकारी लहजे में वो बोला , साहिब साफ़ –साफ़ कही रही है के अब हम ना आई...

बस मुंह से शब्द छूटने भर की देरी थी , एक लपलपाता हुआ, झन्नाटेदार कंटाप उसके गालो पे रसीद हो चुका था .... थप्पड़ की गूँज की मध्य ही उसका सारा पुताई वाला सामान ( रंग भरी बाल्टी डब्बे , ब्रुश , रेकमाल आदि ) दूसरी मंजिल से नीचे ज़मीन पर शोभायमान था ...

आती हुई आफत पुताईवाले ने भांप ली थी , सरपट दौड़ता हुआ सीधे ठेकेदार के पास पंहुचा और हाँफते –हाँफते सारा किस्सा सुना डाला ...
ठेकदार कॉलेज में पुराने समय से काम ले रहा था , इन परिस्थितियों की उसे आदत सी थी ...

मुस्कुराते हुए वह बोला ... बेटा चुप्पेचाप चौथी बार भी कमरा पोत दे और देख ज्यादा मुंहजोरी न करना वरना अगली बार सामान की जगह तू ही नीचे पड़ा होगा ...

अगली शाम चार दफे पुत जाने के बाद बॉस का कमरा जगमगा रहा था और पुताई वाला भी तीन –तीन पैग एक सांस में हलक से नीचे उतारने के बाद बॉस के कदमों में प्रसन्नचित लोटा हुआ था ...

Monday, 5 March 2018

जो है पास ,उसी का जश्न मनाया करो

खिजाब अपनेबालों पे न लगाया करो
तुजुर्बे की चांदी यूँ ही न छिपाया करो

उम्र का हिसाब लगाते क्यों हो परेशां ?
जब जी चाहे , बच्चा बन जाया करो

कब तक रहोगे तमाम सलीको के गुलाम
गुसलखाने को छोड़, खुले में नहाया करो

फिर ना कहना ,के शौक अधूरे रहे
हमारी महफ़िल में आया-जाया करो

अगर लगा दे कोई बिगड़ जाने का इलज़ाम
उससे नज़रे मिला, कहकहे लगाया करो

वक्त भला कब मेरे तेरे  लिए रुका ?
जो है पास ,उसी का जश्न  मनाया करो

Tuesday, 27 February 2018

कुमाँऊनी होली...

कुमाँऊ में होली रंग के साथ-साथ गीत संगीत का भी त्योहार है , अगर अपने को सही करते मै यह कहूं कि गीत संगीत पहले है और रंग बाद में तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ....

होली की यह मस्ती पहाड़ो में बसंत पंचमी से आरंभ हो जाती है और रंग वाली होली के बीत जाने के बाद भी बदस्तूर जारी रहती है ...

कुमाँऊनी होली मुख्यतः तीन प्रकार की होती है ...
१. खड़ी होली 
२. बैठकी होली 
३. महिला होली ...

खड़ी होली- एक प्रकार का सामूहिक गायन और नृत्य है , रंग वाली होली के दिन , ढोल , मंजीरे और चिमटे से उत्पन्न संगीत पे पुरुषों लयबद्ध थिरकते पाँव एक अजब समां प्रस्तुत करतें हैं ...कुर्ता –पैजामा और सर पे गाँधी टोपी पहने हुए हुलियार उड़ते अबीर गुलाल के मध्य कितने दिव्य प्रतीत होते है ...

यह सामूहिक नृत्य एक दायरे में होता है और बीच में होता एक अनुभवी नियंत्रक जो अपने इशारों से इसे सुचारू रूप से सम्पन्दित करता है ....

बैठकी होली:- ये शास्त्रीय संगीत पे आधारित गायन हैं जो रात के इत्मीनान में गाया जाता है , आम तौर पे घर की बैठक के सारे फर्नीचर को बाहर निकाल कर फर्श पे जाजिम (फ़र्श आदि पर बिछाने का छपा हुआ सूत का मोटा और रंगीन बिछावन; मोटीदरी) बिछा दी जाती है , गद्दे और चादर बिछ जाने के बाद तकिये और मसनद श्रोताओ के आराम हेतु रख दिए जाते है ...

हारमोनियम और तबले के संगीत पे यह गायन अनुभवी लोगों के द्वारा ही गाया जाता है और पहाड़ी रास्तो की तरह ही इसमें काफी उतार-चढाव होते है ....

इस संगीतमय प्रस्तुति के दौरान मेजबान की रसोई काफी व्यस्त रहती है , चाय –पकौड़े , गुजिया ,सेव , चिप्स ,पापड़ की अनवरत पूर्ति वहां से होती रहती है ...

लौंग , इलायची ,मिसरी , कसी हुई गरी, एक खांचे वाले कटोरदान में हर आने वाले के स्वागत में प्रस्तुत की जाती है ...

घर की स्त्रियाँ इस मेहमाननवाजी के मध्य अपनी को अछूता नहीं रख पाती और परदे की पीछे से झांक-झांक वो भी इन स्वरलहरियों पे सवार हो ही जाती हैं ...

महिला होली :- फाल्गुन के इस मस्ती में महिला अपने को भला क्यों पीछे रहने दें ? जहाँ खड़ी होली, बैठकी होली में पुरुषों का अधिपत्य है , महिलाओं ने इसे अपने लिए ईजाद कर लिया ... ढोलक और मंजीरे की संगत में होने वाले इस गायन पे स्त्रियों का एकाधिकार है ...
माथे और गाल पे अबीर गुलाल लगाये , गायन में मशगूल माँ और पास पडौस की आंटियो की याद आज भी जेहन में तरोताजा है ...

तो इस होली आप भी कुमाँऊनी होली की तीन स्वरूपों का अवश्य आनंद लें ....

जल कैसे भरूं जमुना गहरी -२

ठाड‌ी भरूं राजा राम जी देखें
बैठी भरूं भीजे चुनरी

जल कैसे भरूं जमुना गहरी -२

धीरे चलूं घर सास बुरी है
धमकि चलूं छलके गगरी

जल कैसे भरूं जमुना गहरी -२
गोदी में बालक सिर पर गागर
परवत से उतरी गोरी
जल कैसे भरूं जमुना गहरी -२

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जोगी आयो शहर में व्योपारी -२

अहा, इस व्योपारी को भूख बहुत है,
पुरिया पकै दे नथ-वाली,
जोगी आयो शहर में व्योपारी।

अहा, इस व्योपारी को प्यास बहुत है,
पनिया-पिला दे नथ वाली,
जोगी आयो शहर में व्योपारी।

अहा, इस व्योपारी को नींद बहुत है,
पलंग बिछाये नथ वाली
जोगी आयो शहर में व्योपारी -२

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रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियाँ के संग….
अबीर उडता गुलाल उडता, उडते सातों रंग
भर पिचकारी सनमुख मारी, अंखियाँ हो गयी बंद…
तबला बाजे, सारंगी बाजे, और बाजे मृदंग
कान्हा जी की बांसुरी बाजे, राधा जी के संग…
रंग में होली कैसे खेलूं री मैं सांवरियाँ के संग….

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झनकारो झनकारो झनकारो
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो – २

तुम हो बृज की सुन्दर गोरी, मैं मथुरा को मतवारो
चुंदरि चादर सभी रंगे हैं, फागुन ऐसे रखवारो।

गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो – २–

सब सखिया मिल खेल रहे हैं, 
दिलवर को दिल है न्यारो
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो – २

अब के फागुन अर्ज करत हूँ, 
दिल कर दे मतवारो
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो – २

भृज मण्डल सब धूम मची है,
खेलत सखिया सब मारो
लपटी झपटी वो बैंया मरोरे, 
मारे मोहन पिचकारी
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो – २

घूंघट खोल गुलाल मलत है, 
बंज करे वो बंजारो
गौरी प्यारो लगो तेरो झनकारो -२
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बलमा घर आयो फागुन में -२
जबसे पिया परदेश सिधारे,
आम लगावे बागन में, बलमा घर…
चैत मास में वन फल पाके,
आम जी पाके सावन में, बलमा घर…
गऊ को गोबर आंगन लिपायो,
आये पिया में हर्ष भई,
मंगल काज करावन में, बलमा घर…
प्रिय बिन बसन रहे सब मैले,
चोली चादर भिजावन में, बलमा घर…
भोजन पान बानये मन से,
लड्डू पेड़ा लावन में, बलमा घर…
सुन्दर तेल फुलेल लगायो,
स्योनिषश्रृंगार करावन में, बलमा घर…
बसन आभूषण साज सजाये,
लागि रही पहिरावन में, बलमा घर…

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शिव के मन माहि बसे काशी -२
आधी काशी में बामन बनिया,
आधी काशी में सन्यासी, शिव के मन
काही करन को बामन बनिया,
काही करन को सन्यासी, शिव के मन…
पूजा करन को बामन बनिया,
सेवा करन को सन्यासी, शिव के मन…
काही को पूजे बामन बनिया,
काही को पूजे सन्यासी, शिव के मन…
देवी को पूजे बामन बनिया,
शिव को पूजे सन्यासी, शिव के मन…
क्या इच्छा पूजे बामन बनिया,
क्या इच्छा पूजे सन्यासी, शिव के मन…
नव सिद्धि पूजे बामन बनिया,
अष्ट सिद्धि पूजे सन्यासी, शिव के मन…

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हाँ हाँ जी हाँ, सीता वन में अकेली कैसे रही है
कैसे रही दिन रात, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता रंग महल को छोड़ चली है
वन में कुटिया बनाई, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता षटरस भोजन छोड‌ चली है
वन में कन्दमूल फल खाई, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता तेल फुलेल को छोडि चली है
वन में धूल रमाई, सीता वन में…
हाँ हाँ जी हाँ, सीता कंदकारो छोड़ चली है
कंटक चरण चलाई, सीता वन में
कैसे रही दिन रात, सीता वन में।

Saturday, 17 February 2018

वक्त बीता ,रिसी जवानी हम-तुम उमरदराज हुए
पर शिकवे-शिकायतों के वही पुराने  अंदाज रहे....

भूल जाता हूँ अक्सर गुसलखाने में तौलिया ले जाना
कितना भाता है तेरा त्योरियां चढ़ा उसे दे जाना ...

गुस्से में न जाने क्या-क्या कह दिया भला बुरा
उसने भी तो जवाब दे दे आग में घी दिया ...

जरा सी बात कितनी बड़ी हुई
हार न मानने की अपनी-अपनी जिद्द रही ...

फिर से सारी दराजों का सामान तितर-बितर है
चीजे ज्यादा संभाल  के रखने का इल्जाम किसी के सर है ...

न कुछ नया बात पुरानी वही है
रात के खाने में फिर से लौकी बनी है ...

कुछ मेहमान बिन बताये साथ ले आया
खाना बनाने से ज्यादा उसने ने मुंह बनाया ...

अनजाने में ही 'गुनाह ए अजीम' कर बैठा ...
अपनी तकरार में उनके मायके का जिक्र का बैठा 

खीज उठता हूँ तेरे फोन के न उठाने पे ...

कहीं की कोफ़्त ,कहीं और ही बरसाने पे

मसरूफ हूँ 

बिन काम काम की  मशक्कत में ,
सबसे जुदा हूँ 
मै शादी-शुदा हूँ 



हार के कगार पर
विषाद अपार पर
सहानभूतियों के अभाव पर
सब कुछ ख़त्म होने के विचार पर
सम्भावनायें तलाशिये …

रोजमर्रा के बरताव पर
फासलों के प्रसार पर
शब्दों से मिले घाव पर
अपने अहमों के टकराव पर
सम्भावनायें तलाशिये …

व्यक्तित्व के बिखराव पर
व्यसनों से जुड़ाव पर
रिक्तता के ख्याल पर
जी के बने जंजाल पर
सम्भावनायें तलाशिये …

सम्भावनायें तलाशिये …
हार में विजय पाने की
विषाद से उबार जाने की
सहनभूतिओं के बिना ही आगे बढ़ जाने की
ध्वंस में नई ईमारत बनाने की

सम्भावनायें तलाशिये … .
अपने बरताव से निखर जाने की
तमाम दूरियां मिटाने की
शब्दों से हृदय तक पहुँच जाने के
अपने अहम को भूल जाने की

सम्भावनायें तलाशिये …
व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने की
व्यसनों से मुक्ति पाने की
नित्य नए अच्छे मित्र बनाने के
उलझने  बिना धैर्य खोये सुलझाने की.....

शायद ये मेडिकल की पढाई का ही दुष्प्रभाव कि आज भी अक्सर  ये अहसास हो ही जाता है कि कोई परीक्षा निकट है और हमने काफी दिनों से मौजमस्ती में समय निकल दिया और पढाई नहीं की...