Friday, 16 February 2018

भंग का रंग ...

कई क्रियाओ , प्रतिक्रियाओ की यह उद्गम स्थली है , तमाम निषेधों से परे , रुचिकर्मो की भरमार है यहाँ , नित्य नए उत्पातों की प्रयोगशाला है ये तो , हॉस्टल की ज़िन्दगी है ही कुछ ऐसी ...बेखौफ , बेलगाम , बिंदास ...

राजमन कल की तैयारी पूरी हैं ना ... बाबा का काम है .... सबकुछ बढ़िया से होना चाहिए ..कोई कमी-बेसी नहीं रहनी चाहिए ... शिवरात्रि से एक दिन पूर्व हिसाब बताने आये कुक को यही तो मेरा स्पष्ट निर्देश था ....

साहब आप चिंता न करो ,सब अच्छे से होगा , आप कल खुद देख लीजियेगा , थोडा मेवा लाना रह गया है ,सुबह को-ऑपरेटिव से जुगाड़ होई जाई ... हिसाब के तेल के धब्बो से युक्त रजिस्टर को बंद करते हुए राजमन मुस्कुराते हुए बोला ...

आज महाशिवरात्रि है, मतलब छुट्टी का दिन .... हम जनवरी , फरवरी करने वाले क्या जाने, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी... ? हम तो सिर्फ इतना जानते है कि आज भोले बाबा के नाम पे मेस में जमकर भंग घुटेगी , ठंडाई छनेगी और खूब बटेगी .... ये तो प्रसाद है सब को मिलेगा , मेस मेम्बर होना न होना मायने नहीं रखता ...

सुबह देर से उठे , नाश्ता भी निबटा चुके है , आज थोडा सभ्य आचरण कर लिया , त्यौहार होने के नाते पहले नहा लिया फिर खाया पर कुछ परम भक्त लोग तडके उठ के , घंटो लाइन में लग ,परमठ जा बाबा को जल चढ़ा आये है, घनघोर श्रद्धा है जनाब जिसके आगे सरे कष्ट तुच्छ ...

कुछ सीटियाबाज टाइप लौंडे कॉलेज कैंपस के अन्दर बने शिव मंदिर के आस-पास अपनी-अपनी मोटर-साइकिलो पे मंडरा रहे है , सुबह-सुबह नाही धोयी अपने बैच की लड़कियों के खुले गीले बालो से टपकते मोतियों के उनके कंधो पे गिरने से उत्पन्न सौदर्य का आनंद लेने ..... जी भर देख लेने के बाद भी अनदेखा कर देने में कितने निपुण है ये नवयुवक ...

अजीब सी शांति और बेचैनी है , दिन की ग्यारह बज चुके है , ठंडाई अभी तक तैयार नहीं हुई है ,मेस के सिलबट्टे पे भांग की घुटाई चालू है , राजमन पूरी तन्मयता के साथ जुटा पड़ा है और हम जैसे अधीर प्रश्नकर्ताओ से कह रहा है “ जब अच्छी तरह घुटी , तभिये तो मजा आई साहिब ... हरे हाथो से सर के बाल हटाते हुए अजब चमक है उसके चेहरे पे आज ...

लो आंखिर कर तैयार हो ही गयी , भांग की ठंडाई से भरे स्टील के गिलास को थाम ही लिया हाथो में ,

ये प्रथम बार है इसलिए थोड़ी हिचकिचाहट भी है पर प्रयोगी उम्र सब पे भारी, एक आध घूट मारने के बाद अब जिज्ञासा शांत है , हलकी कालीमिर्च का तीखापन लिए ये पेय पदार्थ वाकई स्वादिष्ट बना है ...
हलक से नीचे पूरा गिलास उतर चुका है , कुछ होने / लगने की प्रतीक्षा है , पर कुछ हो नहीं रहा इसलिए हर हर महादेव के जयकारे के साथ दूसरा गिलास भी अन्दर ....

तभी ऊपर वाली विंग से शोर आता हुआ सुनायी दिया , कालू आग लगी है करके जोर जोर से चिल्ला रहा है , एक दो कमरों में बाल्टी भर के पानी भी उड़ेल चुका है , गुरुदेव सबको HARRISON खोल के पढ़ा रहे है , मैकू के हाथ दीवार से चिपक चुके है , सैंडी की हंसी रुकने का नाम ही ले रही , दो चार कंटाप खाने के बाद और तेज हो जाती है ...

गुरुदेव को ज्यादा हो गयी मगर खुराफाती लौंडो ने एंटी-भांग के नाम पे और भांग खिला दी और उनके शुभचिंतक मित्र उन्हें दौड़ा के इमरजेंसी ले गए है , गुरुदेव का वही क्रियाकलाप जारी है , माँ बहन को याद करने के साथ अब वो JRS को HARRISON पढ़ा रहे है , बडके यादव हवा में उड़ रहे है और छुटके उनको जमीन में लाने की असफल कोशिश...

चारो ओर अफरातफरी का माहौल है , कोई राकेट बन गया तो कोई पेड़ ,
एक महाशय दस बार नहा चुके है , रही सही कसर जूनियर्स ने पूरी कर दी, दस बालको की ट्रेन दौड़ रही है हॉस्टल में और वो भी पूरे साउंड इफ़ेक्ट के साथ

और इन सब के बीच ...अरे मै कहाँ हूँ ??? हां याद आया न रुकने वाली हंसी के साथ तीन बार को-ऑपरेटिव जा कर बंद मक्खन /समोसा खा चुका और फिर भी जोर जोर से हँसते हुए हर एक से बोल रहा हूँ .... यार बहुत भूख लगी है कुछ खिला दे ....

यक्ष प्रश्न ...

महाभारत में एक बहुचर्चित यक्ष-युधिष्ठिर संवाद है जिसमे यक्ष ,ज्येष्ठ कुंती पुत्र से तरह -तरह के प्रश्न पूछते है ...

यदि ये प्रश्न किसी मेडिको से पूछे जाते तो क्या क्या  जवाब होते  जरा गौर फरमाइए ...

यक्ष प्रश्न : कौन हूं मैं?

मेडिको  उत्तर : पढाई के बोझ का मारा मेडिको , जिसको न आगे का पता न पीछे का ... बस गधे/बैल की तरह मेहनत किये जा रहा है ....

यक्ष प्रश्न: जीवन का उद्देश्य क्या है?

मेडिको उत्तर: किसी भी तरह suppli के अपयश को बचाना ही जीवन का उद्देश्य है ...

यक्ष प्रश्न: जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है?

मेडिको  उत्तर: C2H5OH का सेवन करने वाला ...

यक्ष प्रश्न:- वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?

मेडिको  उत्तर:- कमरे में उपलब्ध गद्दे की नीचे छुपा के रखा जाने वाला  साहित्य 

यक्ष प्रश्न: संसार में दुःख क्यों है?

मेडिको  उत्तर: संसार में घंटा दुःख है , जरा साढ़े चार में ४ प्रोफ और प्री PG की तैयारी करके देखो ,बता चल जायेगा दुःख किसे कहते है ...

यक्ष प्रश्न: क्या ईश्वर है? कौन है वह? क्या वह स्त्री है या पुरुष?

मेडिको  उत्तर:  हाँ है , हर विषय का है ,ईश्वर EXAMINER है , वो कुछ भी हो सकता है ...

यक्ष प्रश्न: भाग्य क्या है?

मेडिको  उत्तर: किसी पार्टी में OLD MONK की चाह रखने वाले को JOHNY WALKER BLACK LABEL मिल जाना ही भाग्य है ...

यक्ष प्रश्न: चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?

मेडिको  उत्तर: ये असम्भव है , बजरंगी बन इसकी असफल कोशिश की जा सकती है ..

यक्ष प्रश्न: सच्चा प्रेम क्या है?

मेडिको  उत्तर: ओवर होने के कारण उल्टी कर रहे साथी की पीठ सहलाना ही सच्चा प्रेम है ..

यक्ष प्रश्न: नशा क्या है?

मेडिको  उत्तर: कभी आओ BH-2 में प्रोफ के रिजल्ट वाले दिन , 

यक्ष प्रश्न: मुक्ति क्या है?

मेडिको  – मुक्ति नाम से कोई लड़की अपने बैच में नहीं है ...

यक्ष प्रश्न: बुद्धिमान कौन है?
मेडिको  उत्तर: कम से कम मेहनत में पास हो जाने वाला ही बुद्धिमान है 

यक्ष प्रश्न: चोर कौन है?
मेडिको  उत्तर: अपने PG होने का रौब जमा , बैच की लड़की को ले उड़ने वाला ही चोर है 

यक्ष प्रश्न: नरक क्या है?

मेडिको  उत्तर: फाइनल प्रोफ में बिना छुट्टी के लगातार   मेडिसिन और सर्जरी का प्रक्टिकल एग्जाम पड़ जाना ही नरक है... 

यक्ष प्रश्न: जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?

मेडिको  उत्तर: बोरिंग लेक्चर में हम सभी 

यक्ष प्रश्न: दुर्भाग्य का कारण क्या है?

मेडिको  उत्तर: पहले ही प्रोफ में अफेयर ...

यक्ष प्रश्न: सौभाग्य का कारण क्या है?

मेडिको  उत्तर: अंतिम प्रोफ तक बचे रहना ...

यक्ष प्रश्न: सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?

मेडिको  उत्तर: वही जो समुद्र मंथन से निकली थी , अरे अमृत नहीं असली अमृत C2H5OH

यक्ष प्रश्न: दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?

मेडिको  उत्तर: अगली दारू पार्टी को और बेहतर कैसे बनाया जाये ...

यक्ष प्रश्न: संसार को कौन जीतता है?
मेडिको  उत्तर: जो मस्त मलंग रहे ...

यक्ष प्रश्न: भय से मुक्ति कैसे संभव है?

मेडिको  उत्तर:  अस्थाई रूप से , बूढ़े साधू (OLD MONK) की शरण में 

यक्ष प्रश्न: मुक्त कौन है?
मेडिको  उत्तर: महीने के अंत में भी जिस पे कोई उधार न हो 

यक्ष प्रश्न: अज्ञान क्या है?

मेडिको  उत्तर: ये जान लेने के पश्चात भी कि जिस कन्या पे तुम सेंटी हो वो 
किसी अन्य पर फ़िदा है , किसी चमत्कार की आशा करना ही अज्ञान है 

यक्ष प्रश्न: वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?

मेडिको  उत्तर: दोस्त की MOTERCYCLE 

यक्ष प्रश्न:  परम सत्य क्या है?
मेडिको  उत्तर: जिन्दगी भर लगी रहेगी ये ही परम सत्य है 

यक्ष प्रश्नः मनुष्य का साथ कौन देता है?

मेडिको  उत्तरः दारूबाजी / सुट्टेबजी से बने परम मित्र 

यक्ष प्रश्नः कौन सा शास्त्र है, जिसका अध्ययन करके मनुष्य बुद्धिमान बनता है?

मेडिको  उत्तरः चिकित्सा साहित्य (मेडिकल लिटरेचर ,ML)

यक्ष प्रश्नः भूमि से भारी चीज क्या है?

मेडिको  उत्तरः घर से लौटी प्रेमिका का बैग ...

यक्ष प्रश्नः आकाश से भी ऊंचा कौन है?
मेडिको  उत्तरः  बड़ी बड़ी फेकने वाला ...

यक्ष प्रश्नः हवा से भी तेज चलने वाला कौन है?

मेडिको  उत्तरः दोस्त की नयी motercycle का ट्रियल लेने वाला 

यक्ष प्रश्नः  घास से भी तुच्छ चीज क्या है?

मेडिको  उत्तरः मेस में सातों दिन veg खाना ...

यक्ष प्रश्न : बर्तनों में सबसे बड़ा कौन-सा है?

मेडिको  उत्तरः लाला  के कमरे में रखा पांच लीटर का प्रेशर कुकर , जिसमें शनिवार की रात को मुर्गा बनता है ....

यक्ष प्रश्न : सुख क्या है?

मेडिको  उत्तरः एग्जाम के पूर्व रात्रि important question पता चल जाना ही सुख है.... 

यक्ष प्रश्न : किसके छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बनता है ?

मेडिको  : Girls Hostel (GH) के चक्कर छूटने से लड़का boys hostel में फिर से सर्वप्रिय हो जाता है ...

यक्ष प्रश्न : किस चीज के खो जाने पर दुःख होता है ?

मेडिको  उत्तरः दो जोड़ी में से एक जोड़ी, बाहर विंग में सूख रहे नए कच्छे-बनियान का आंधी में उड़के खो जाने पर....

यक्ष प्रश्न : किस चीज को गंवाकर मनुष्य धनी बनता है?
मेडिको  उत्तरः मित्र के अच्छे नंबर्स आने से उत्पन्न हुई  इर्ष्या को ...

यक्ष प्रश्न : संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?

मेडिको  उत्तरः ये जानते हुए भी यहाँ हर दम लगी रहती है  हर साल भर भर के मेडिको आते है... 

यक्ष प्रश्न : कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है?

मेडिको  उत्तरः जो अपनी साथियों को अपना प्रतिद्वंदी न माने ...



यक्ष प्रश्न : रोचक वार्ता क्या है?
मेडिको  उत्तरः रात की तीन बजे तक होने वाली BC...

Sunday, 10 April 2016

"शिकाकाई" साबुन

अभी पिछले हफ्ते की बात है इस मध्यमवर्गी परिवार में इस बात पे कोहराम मच गया कि सर के बाल धोने के लिए ये "शिकाकाई" साबुन किसने मंगवाया ??? , जब सब लोग नहाने के साबुन से अब तक ऐसा करते आये हैं तो ये अतिरिक्त फिजूलखर्ची क्यों ???, ऊपर से बाबा ने भी तंज जड़ दिया, " तुम लोगो ने अब तक गरीबी देखी कहाँ है ? इस लिए अनाप-सनाप पैसे उड़ाए जाओ.... हमारे ज़माने में अगर कपडे धोने वाले साबुन की पीली बट्टी भी हमको मिल जाती थी तो हम अपने आप को खुशकिस्मत समझते थे , जरा सी शहर की हवा क्या लगी तुम लोगो के तो पर ही निकल आये.....

बाबा के तरफ से निकले इस हृदय विदारक तीर ने माँ- बेटी को अंदर तक बीध डाला , ऊपर से पिताजी अपने पिताजी के स्वर में स्वर मिलाते हुए बोल उठे.... देखो श्रीमती जी मुझे इसके लक्षण अच्छे नहीं दिखाई दे रहे , बालों में ये महंगा साबुन लगा क्या इसको हीरोइन बनना है ,अगर ऐसे ही कुछ विचार है तो अभी बम्बई के टिकट कटा देता हूँ , पढ़ने-लिखने की क्या जरुरत और तुम भी साथ ही चले जाना आखिर शय भी तो तुम्हारी ही दी हुई है....

पिताजी के इस मश्वरे ने रही सही कसर भी पूरी कर दी , माँ के लिए छिपने ,बचने का कोई स्थान न बचा , किशोरावस्था में पहुंची अपनी लाड़ली की इस विशेष साबुन मांग को पंसारी की दुकान में उसने जो पूरा किया था ... इस छोटी सी बात का इतना बड़ा बखेड़ा बन जायेगा इस बात का उसे जरा भी इल्म न था पर मां की ममता इस पूरे हो हल्ले के दौरान ढाल बनी अपनी सुता की रक्षा के लिए विद्यमान थी , सारे आक्षेप अपने ऊपर लेते हुए वह पूरी प्रतिबद्धता और संयम के साथ मैदान में डटी रही....

जब तक माँ तब तक मायका...

जब तक माँ तब तक मायका... इस बात को बेटियों से बेहतर भला कौन समझ सकता है ...?
भरा पूरा घर है , पति है, बच्चे है पर अपनी पुरानी पहचान से स्वयं को जोड़े रखने का एकमात्र वो ही तो जरिया है...

बिना संकोच अपना बचपन फिर से जीने, जिद्द मनवाने, नाराज हो जाने, डांट खाने, खिलाने का एक वो ही तो माध्यम है...

माँ -बेटी का संबंध पिता- पुत्र के सम्बन्ध की तुलना में ज्यादा भावुक,ज्यादा प्रगाढ़ और ज्यादा जीवंत होता है , संभवतः स्त्री होना और उससे जुडी वेदनाओं से गुजरना , पुरुष प्रधान समाज की सीमाओ का अनुपालन और विवाहोपरान्त अपनी पुरानी पहचान तत्काल खो ,नए अनजान परिवेश में नयी पहचान पाना दोनों को एक दूसरे के और निकट लाता है ...

गर्भावस्था, प्रसूति, बच्चों के लालन पालन से जुडी पेचेेदगियो से गुजरना दोनों के रक्तसंबंध को और गाढा करता है, यहाँ पिता-पुत्र दोनों के पुरुष होने के जैसा अहम् का टकराव नहीं होता अपितु स्त्री होने की सीमाओ का ज्ञान दोनों में सखाभाव और संवेदनशीलता उत्पन्न करता है...

पिता, भाई, भाभी लाड जताने वाले हो सकते है पर मायके की आत्मा तो माँ में ही है, संसार में एक वो ही है जिस पे बेटी का बस चल सकता है, शेष सारे मायकेे के सम्बन्ध कुछ मर्यादाए , कुछ औपचारिकतायें और कुछ किन्तु परंतु लिए हुए होते है...

Monday, 4 April 2016

क्राइसिस ऑफ़ कांशस

हिन्दुस्तान में पढ़े-लिखे लोग कभी-कभी एक बीमारी के शिकार हो जाते हैं! उसका नाम "क्राइसिस ऑफ़ कांशस" है !… कुछ डॉक्टर उसी में ""क्राइसिस ऑफ़ फ़ैथ" नाम की एक दूसरी बीमारी भी बारीकी से ढूँढ निकालते हैं . यह बीमारी पढ़े-लिखे लोगो में आमतौर से उन्ही को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं और जो वास्तव में बुद्धि के सहारे नहीं, बल्कि आहार-निंद्रा-भय-मैथुन के सहारे जीवित रहते हैं ( क्योंकि अकेले बुद्धि के सहारे जीवित रहना एक नामुमकिन बात है)
इस बीमारी में मरीज मानसिक तनाव और निराशावाद के हल्ले में लम्बे-लम्बे वक्तव्य देता है , जोर-जोर से बहस करता है, बुद्धिजीवी होने के कारण अपने को बीमार और बीमार होने के कारण अपने को बुद्धिजीवी साबित करता है और अंत में इस बीमारी का अंत कॉफ़ी हाउस की बहसों में, शराब की बोतलों में, आवारा औरतों की बाँहों में, सरकारी नौकरी में और कभी कभी आत्महत्या में होता है
----------------------------------- राग दरबारी- श्रीलाल शुक्ल पृष्ठ १४७.....

Saturday, 26 March 2016

#प्रेश्या , #खबररंडी , #presstitute यही तो प्रचलित संज्ञाएं हैं ना आजकल हमारी मीडिया के बारे में और हो भी क्यों न इन लोगो का आचरण ही ऐसा रहा है , मोदी सरकार के आने के पूर्व इनकी कोशिश थी कि वो न आ पाए और आने के बाद तो जैसे इनके सीने पर सांप ही लौटने लगे और अब यह इस मंशा से काम कर रहे कि वो चल न पाये ...

खबरनवीशो की एक पूरी जमात जुटी हुई है सामान्य जनभावना के खिलाफ रिपोर्टिंग और ख़बरें प्रसारित करने में , तिल का ताड बनाया जाता है, ताड़ का पहाड़ और फिर उसी पहाड़ पे चढ़कर गोले दागे जाते है , मोदी विरोध का आलम तो यह है कि उसके लिए राष्ट्र विरोध भी मंजूर है , अंग्रेजी पत्रकारिता जिसका दायरा भारत में तो सीमित है का स्तर तो और भी निम्नकोटि का है , कुछ एक चैनल को देख के ऐसा लगता है मानो वो पाकिस्तान से प्रसारित हो रहे हो , अंतर्राष्ट्रीय पटल पे भारत की छवि धूमिल करना ही इनका एकमात्र मकसद है....

किसी भी संस्थान को चलाने का एक अर्थतंत्र होता है , उसको समझिए , उसी को चिन्हित कर प्रहार कीजिये , ये लोग सिर्फ पैसे की भाषा समझते है उसे पे चोट कीजिये ,खाली गुस्सा करने या खिस्याने से काम नहीं चलेगा...

अगर आप किसी न्यूज़ चैनल से इत्तेफाक नहीं रखते तो केवल उसको न देखने भर से आप का कार्य संपन्न नहीं हो जाता , ये भी सुनिश्चित कीजिये कहीं आप उसके लिए अपने केबल या डी टी एच ऑपरेटर को पैसे तो नहीं दे रहे , आपके घर आपके ड्राइंग रूम में आकर आपको मुंह चिढ़ाने वाले पत्रकारों के कार्यक्रम यू ही नहीं बन जाते , उनके पीछे प्रायोजकों का पोषण होता है , ऐसे प्रायोजकों के पहचानिए और उनके सामान का बहिष्कार कीजिये , उन उत्पादों को अपनाइए जिनका आपके दिल को जलने वालो से कोई गठजोड़ नजर नहीं आता , उपभोक्ता आप है और इस बाजारवाद चुनने की शक्ति आपके हाथ है ,आप सर्वशक्तिशाली हैं.... आमिरखान और शाहरुख़ खान के उदाहरण आपके सामने हैं , गंद फ़ैलाने का खामियाजा जब पैसो के रूप में भरा तो कैसे मिमयाने लगे....

अंगेजी भाषा के अख़बार जो अपने शीर्षकों और मुख्य पृष्ठ पे जगह देने के लिहाज से हमारे राष्ट्र और राष्ट्रभावना के लिए तंगदिल नज़र आते है उनको उपयोग पढ़ने के लिए नहीं टॉयलेट के टिश्यू पेपर की तरह ही करे और इस भ्रान्ति का त्याग करे कि अंग्रेजी का अख़बार और न्यूज़ चैनल बच्चों की अंग्रेजी अच्छी करने के लिए जरुरी हैं इसके लिए और भी बतरे श्रेष्ठ तरीके हैं उन्हें अपनाए , चली आ रही गलत मान्यताओं के त्याग का समय है , अंग्रेजी सुधारने के चक्कर में संस्कारो को प्रदूषित न होने दे....

समाज में हो रही घटनाओं पे अपने दृष्टिकोण के समर्थन और पोषण हेतु इस दलाल मीडिया से आशा न रखें, वो हर हाल में अपना एजेंडा ही चलाएंगे , घटनाओं को उसी तरह से दिखाया जायेगा जैसे उनके आका बताएँगे , इन सब को देख और सुन अपना दिल न जलाए , अपनी बात कहने और भड़ास निकालने के लिए सोशल मीडिया जैसा सशक्त माध्यम का इस्तेमाल करें , मुखर हो पुरजोर तार्किक तरीके से अपनी बात रखें ,सत्य को परेशान किया जा सकता है पराजित नहीं...

घर के सात्विक खाने का आनंद लें रोज ज्यादा चटपटा खाने से हाजमा ख़राब होने का भय रहता , ८ से ९ काम से काम एक घंटा दूरदर्शन समाचार जरूर देखें , मुल्क में बहुत कुछ उम्दा भी हो रहा है.....

जो दिखता है वही बिकता से उलट , जो बिकता है वही दिखता को समझिए , अपने अंदर मौजूद उपभोक्ता की हनुमान रूपी शक्ति का जगाइए , एक बार बस ठान लीजये ये खबर व्यापारी आपका चरण वंदन न करें तो बताईएगा ...

Thursday, 17 March 2016

लकड़ी को खोजती बच्चो की उत्पाती टोली
होलिका दहन की तैयारियाँ जोरो से होती
गुप्ताजी के घर चंदे पे चकल्लस है
२१ ,५१ ,१०१ के शोर में रस ही रस है....

बगल के मुहल्ले से कड़ी प्रतिस्पर्धा है
अपनी ऊँचे हरे बांस का ही हो- हल्ला है
सुतली पे लई से चिपके तिकोने लहरते हैं
पुरानी खटिया की चोरी पे शर्माजी बिदकते है....

आंटी लोगो का दल गुजिया-पापड़ में व्यस्त है
रस्तोगी जी का हुआ ,अब रुख पंत जी के घर है
खोलते तेल में तलती मठरी की सुगंध लाजवाब है
मुँह में पानी और दिल चखने को बेताब है....

माँ ने थोड़ा धीरज धरने को कहा
पर जिद्दी यह बालमन अपनी पे अड़ा
गरमा-गर्म पकवान जो मुख में धरे
जीभ-जलने पे फ़ौरन फूं -फूं करने लगे ....

स्त्रियों के सामूहिक श्रम से उपजा ये स्नेह निश्छल हैँ
मिलके उत्सव बनाने में कितना अपनापन है
गीत ,हंसी-ठिठोली ,छेड़छाड़ तो कभी खुसर-पुसर है
फाल्गुन के मस्ती का सब पे असर है ....

घर के ड्राइंग रूम में बैठकी होली सजी है
फर्श पे दरी गद्दे के ऊपर ,जाजम -चाँदनी बिछी है
सोफ़ा ,मेज कुर्सी ,टेबल बाहर गैलरी पे पड़े हैं
आस-पड़ोस के बच्चे उनपे बेफिकर कूद रहे हैं....

हर अतिथि के माथे अबीर ,गुलाल से तिलक है
सत्कार में सौंफ, मिसरी, छोटी इलायची प्रस्तुत है
चूल्हे पे बड़े से भौगोने में ढेरों चाय चढ़ी है
पकौड़ो के लिए घुले बेसन में माँ की अंगुलियाँ सनी हैं...

फाल्गुन के गीतों में शास्त्रीय संगीत की प्रधानता है
बजता हारमोनियम , और तबला इसमें जान डालता है
मिलती दादो के बीच गायक लंबा सुर तानता है
कितनी फरमाइशें, दिल एक से कहाँ मानता है ?

खुशनुमा बदलता मौसम ,त्यौहार के लिए मस्त है
केवल एकदिन का जश्न नहीं , हफ्तेभर का बंदोबस्त है
गिले-शिकवे भूल , सबसे गले मिलने पर जोर है
भंग की मस्ती में हर छोटा बड़ा गुनाह ना काबिल-ए-गौर है....

स्कूल से होली की छुट्टियों के पूर्व का आंखिरी दिन
सख्त चेतावनियों के बावजूद तैयारियाँ विभिन्न
बस्ते के एक कौने में छिपाया रंग और गुलाल
बस छुट्टी की लंबी घंटी का बड़ी ही शिद्दत से इन्तेजार...

गाल , बाल,यूनिफार्म, मौजे सब रंग में सने
छीनाझपटी में तुरपन उधड़ी ,कुछ बट्टन टूटे
सफ़ेद कमीज पे पक्के रंग के दाग से डरे
घर पे मम्मी के गुस्से का सामना हम कैसे करें ...
सहपाठिन को कैसे लगाये रंग थोड़ी हिचकिचाहट
देख़ो अनायास बंध टूटे जो देखा उसने मुस्कुराकर
कोमल गालो पे होले से हम अबीर मलने लगे
नव यौवना का स्पर्श पा अंदर तक सिहर उठे

आज रात्रि होलिका दहन का प्रोग्राम है
सबको देर रात्रि तक जगाने का इन्तेजाम है
VCR पे लगातार दो पिक्चर देख तीसरी पे जुटे
आती नींद बावजूद आँख मिचमिचाते वहीँ डटे

देर रात्रि होलिका जलने से पूर्व सबको जगाया
खाली कंटर पीटा ,दरवाजे का कुंडा जोरो से बजाया
कोई सोता रहा तो कोई निकल बाहर आया
कर्मठ कार्यकर्ताओं ने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया

विधिवत पूजा-अर्चना उपरांत होलिका जली
बुराई पे अच्छाई की जीत बड़ी धूम-धाम से मनी
ईख पे गेहूं की बालियाँ लगा आग में सेकते हैं
प्रजव्ल्लित अग्नि की प्रदिक्षणा कर आशीर्वाद लेते हैं

बूंदी के दो-दो लड्डू प्रसाद में बटे
लौड़-स्पीकर पे होली के गाने जोरो से बजे
अबीर गुलाल जम-जम के उड़े
थके हारे सब थोड़ी देर सोने चले

प्रातः हम लोग थोड़ी देर से जगे
रंग वाली होली की तैयारियों में लगे
कडुआ तेल पूरे शरीर में अच्छी तरह पोता
सड़क से जल्दी आ गया होली खेलने का न्योता

सभी संगी साथी आपस में भिड़े
सफ़ेद कुर्ते पैजामे पे हर पड़ता रंग खिले
जमकर मचाया होली का हुडदंग
न शराब की जरुरत और ना ही पी भंग

हर आते जाते पे पानी की बौछार है
पिचकारी की धार , गुब्बारे की मार है
हर अजनबी से होली है की पुकार है
भूख लगने पे गुजिया की दरकार है

दिन भर होली की खूब मस्ती रही
कभी चिप्स पापड़ सूते , कभी बड़ा-दही
मुहल्ले का हर आंगन अपना से लगे
बचपन चलता रहे न हो कभी बड़े...

दोपहर हुई सूरज चढ़ आया
मम्मी ने बस करो का फरमान सुनाया
बाथरूम में नहाने के लिए गर्म पानी मिले
चेहरे का रंग छुटाने में पसीने छूटे

नहा धो जैसे ही बाहर निकले
कुछ साथी पोत गए आकर फिर से
कहाँ तुमने खेली हम संग होली
हमारा हक़ भी बनता हम हैं हमजोली

त्यौहार बीता खूब रहा धमाल
अब सारे हंगामे होंगेअगले साल
शाम को होली मिलन में जायेंगे
हर मिलने वाले को दिल से गले लगायेंगे

क्यों बड़े हुए क्या मिला बड़े शहर आकर
फ्लैट में अजनबियों सी जिंदगी बिताकर
कोई न मिलता यहाँ खुद से आकर
चार पैसे कमाये अपनापन गंवाकर

हर साल हर होली मेरा दिल जलता है
होलिका के खजूर के अधजले बूटे सा सुलगता है
गम को स्कॉच व्हिस्की में घोलता हूँ
नशे में खुद को भूलने की कोशिश करता हूँ

त्यौहार अब दिल से नहीं मनाता
औपचरिकता पूरी करने के बाजार से गुजिया ले आता
होलिका जले देखे जमाना गुजर गया
तरक्की के इस खेल में कितनो से कट गया....

पुराना बचपन रह रह के याद आता है
दिल के किसे कौने में पड़ा मासूम बच्चा झटपटाता है
बार बार मन उसी पुरानी होली के लिए मचलता है
खुद के बनाये जाल से देखे कौन पहले निकलता है.....