Friday, 22 August 2014

दोस्ती

अपनी दोस्ती का जश्न मनाने के लिए क्या हमें कोई तारीख मुकर्रर करने की जरुरत है ? भइया हम तो रोज मनाते है और जमकर मनाते है.… 

ईश्वर ने नेक माँ-बाप दिए , लाड करने वाले भाई बहन , सबसे पुराने,पक्के और सच्चे दोस्त आज भी वही है.… हमारे पिता थोड़े सख्त मिजाज के थे , उस समय प्रचलन भी वैसा था , होते हुए भी बच्चों से स्नेह का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन प्रायः पिता नहीं किया करते थे पर इसकी भरपूर भरपाई माँ के द्वारा कर दी जाती थी.… , हमारी गलतियों ,शैतानियों ,परेशानियों ,जरुरतो और गुस्से का पहला ठिकाना वो ही थी ,माँ कवच की तरह होती थी, हर विपदा में रक्षण उसी से प्राप्त होता था.…

अच्छे संस्कार मिले ,पढ़ लिख के अल्लाह मियां की गाय की तरह कॉलेज पहुंच गए.… बस यहीं से लाइफ ने एक जबरदस्त यू-टर्न मारा। अपनी क़ाबलियत सिद्ध होने के तमगे साथ-साथ एकाएक आज़ाद माहौल मिला, सुबह के संडास से लेकर रात के २ बजे की चाय के बीच हर छोटी बड़ी चीज हमारे लिए नई थी.… और हमारे साथ पहली बार जिस किसी ने इनका अनुभव किया वो कमीने दोस्त ही जिंदगी की कमाई हुई सबसे बड़ी दौलत है और हमारे सबसे बड़े राजदार भी...

कौन सा दिन नहीं जब ये ससुरे याद नहीं आते , इन्हे गरियाने,लतियाने का मन नहीं करता, बस बंधे रहते है कुछ खुद की बनाई हुई मजबूरियों से और काफी समय यूँ ही गुजर जाता है इन से मिले और बात किये हुए.…

और जब कभी सोमरस के आधिपत्य में बहुत खुश और Senti हो जाते है तो फ़ोन पे चिल्लाकर देर तक बात करके इन्हे अपने होने अहसास करा देते है.… फिर से मिलने के वादो के बीच हम फिर से मशगूल हो जाते है अपने अपने उन्ही रोजमर्रा के कामो में.…

शादी के बाद बीवी से आस रहती उन्ही कमीनो के थोड़े बहुत अंश की जो पूरी न होने पर अक्सर हमारे बीच एक न खत्म होने वाली बहस का कारण बन जाती है.....

पतंगबाज़ी

बहुत ज़्यादा साधन -सुलभ तो नहीं पर अन्वेषणों से परिपूर्ण था हमारा बचपन.... हर छोटी-बड़ी बात कुछ न कुछ सिखाती थी और ऐसे ही कुछ सीख-सीख कर हम बड़े हो गए....
मुक्कमल तो कोई नहीं हो सकता...अगर हो जाए तो खुदा न बन जाए.… 
बचपन में पतंगबाज़ी का बहुत शौक था... पिताजी को ये पसंद तो न था पर गर्मियों की छुट्टियों में इसकी इज़ाज़त मिल ही जाती थी और साथ-साथ एक हिदायत भी कि सम्भल के...इसके आगे कबूतरबाज़ी , मुर्गाबाज़ी ,बटेरबाज़ी शुरू मत कर देना और ये रियायत बस स्कूल खुलने तक ही है...
छिद्दन मियां की दुकान हमारे शहर में पतंगबाज़ी के सामान के लिए सबसे मशहूर थी, कल्लूमल हलवाई और बूरा बताशा गली की मंडराती मक्खियों से ज्यादा यहाँ हम जैसे पतंगबाज़ बालको की भीड़ होती थी और सबके सब भिड़े रहते थे जल्दी से जल्दी सामान लेने के लिए....
सालाना परीक्षा पास करने के बाद १० रुपिये मिलते थे और हम भी किसी कुशल अर्थशास्त्री की तरह अपना बजट बनाने लगते थे.… दो रुपिये की चरखी , उस पे चार रूपिए की पतली सद्दी का गुल्ला , एक-एक रुपिये लाल और काला रामपुरी मांझा , पच्चीस पैसे वाली चार पतंग, और एक अठन्नी वाला चाँदतारा... बांकी के बचे पचास पैसे लाल जीभ की गोली और चूरन के लिए होते थे। पाई-पाई का इतना सटीक मौखिक हिसाब होता था कि साल भर कान मरोड़ने वाले गणित के मास्साब अगर उतर पुस्तिकाओ की जगह इसे देखते तो जरुर हमपे फर्क करते....
शिक्षा में रूचि रखने की बात कहने की बजाय अगर रूचि में शिक्षा रख दी जाए तो इस देश की कायाकल्प हो जाये ....
घर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पे स्थित इस दूकान पर स्वयं अकेले ही खरीदारी करने जाते थे, भीड़ से बचते बचाते उस एक अदद जान से प्यारे दस के नोट को अपने दिल से लगाये हुए ....
कनकव्वे बड़ी ही बारीकी से छांटे जाते थे, कटी-फटी न हो ,बीच की बांस की तिल्ली मोटी न हो और पतियाना निकाल के उसकी प्रत्यास्था (elasticity) का झट अनुमान लगा लेना कितना विशिष्ट अनुभव प्रदान करता था ....
कन्ने (सुत्तल) बांधने ने गाँठ लगाने का पहला रोचक अनुभव दिया , अगली सुतल छोटी करने से पतंग घूमेगी मगर कम हवा में भी उड़ जायेगी , पिछली को छोटी करने पे शुद्ध (स्थिर) रहेगी और अगर तेज हवा है तो पुछल्ला बाँध के आप अपनी पतंग को उड़ा सकते है और ऐसी न जाने कितनी सुनी-सुनायी बातों को खुद अनुभव करके परखा और उन्हें सही पाया वरना आजकल तो सियासी झूठ को बिना जांचे हम सच मान लेते है और कुछ बेगैरतो की स्वार्थ की अग्नि में खुद को इंधन की तरह झोंक देते है.... खुद तो जलते ही है, कई औरो को भी जलाते है....
बचपन में सयाने थे और सयाने होके बेवकूफ हो गये ....
छुटकाई लेने की प्रक्रिया में छत और मैदान के विभिन्न कोणों को भांप लिया जाता।आटे,भात और बेल के फल का गोंद की जगह पतंग चिपकाने के उपयोग ने हमें उपलब्ध साधनों में काम चलाने की कला में निपुण किया ...
पेंच लड़ाने ने ज़िन्दगी की पेचीदगियों से दो-चार करवाया , कब अपने के ऊपर रखना है, कब नीचे, कब ढील देनी है, कब खेच मारनी है और कब बिन मौका दिए हत्ते से सूत देना इसका पहला सबक हमें यहीं से मिला...
किसी की पतंग काटने पर आह्लाद के उस प्रकटीकरण ने खुद को व्यक्त करना सिखाया , खुद की कट जाने के विषाद ने पुनः प्रयास करने को उकसाया, कइयो की भीड़ और डंडे पे लगे झाड के बीच भी कटी पतंग को लूट लेने की सफलता ने खुद पे गर्व करना सिखाया, उलझी हुई सद्दी को सुलझाने ने समस्याओं से निबटने और अटियां करने की कसरत ने चीजों को पास-पास सहेज कर रखने की सलाहियत से हमें नवाज़ा...
कभी टीवी के एंटीने , पेड़ , बिजली के तारों पे फंसी पतंग को सफलतापूर्वक निकाल लेने ने छोटे-छोटे सधे हुए निरंतर होते प्रयासों की उपयोगिता समझाई और हर स्थिति में डंटे रहने की प्रेरणा दी ....
कितनी तरक्की कर ली ,छोटे कस्बो के बड़े घरो से निकल हम बड़े महानगरो के छोटे-छोटे flats में आ गए , और कीमत अदा की छत और आँगन को खो कर ,घर के साथ दिल भी छोटे हो गए, रहन-सहन का स्तर तो जरूर ऊँचा हुआ पर कुछ पा लेने की उधेड़बुन में स्वयं न जाने कितना नीचे गिर गए ,बड़ी-बड़ी चाहतो ने छोटी-छोटी खुशियाँ हम से छीन ली , और इस सबका सबसे बड़ा खामियाजा हमारे बाद की पीढ़ी उठा रही जो भौतिक साधनों में बचपन की खुशियाँ तलाश रही है ...
मुट्ठी में मिटटी भरके हवा का रुख को पहचानने की उस पतंगबाजी वाली आदत ने ही शायद मुझे अपनी मिट्टी से जोड़े रखा है और एक अपराधबोध के साथ ऐसा लिखने को निरंतर प्रेरित करती रहती है ...
“संगमरमर पे चलता हूँ तो फिसल जाता हूँ
मिट्टी पे चलकर ही अपनी पकड़ बनता हूँ “

Friday, 8 August 2014

अच्छा खोजिए , हमेशा कुछ न कुछ जरूर मिलेगा ,

बात ये नहीं कि पहले के ज़माने में ही अच्छी फिल्में बनती थी ,आज कल भी बनती है बस जरा चकाचौध में खो जाती है.… पर काम बनती है
समय बदला है , लोग बदले है ,सामाजिक सरोकार बदले है ,इसलिए फिल्में भी बदली है.… अब मनोरंजन के अनगिनित साधन उपलब्ध है ,पहले ऐसा न था.… पूरे परिवार  को ले एक साथ सिनेमा हाल में फिल्म देखना किसी उत्सव से कम न था जो साल में यदाकदा ही संभव हो पाता था और और उसकी मधुर स्मृतियाँ जेहन में  आज भी शेष है.।

अब ज़माना weekend और multiplex का है। फिल्म देखना कईयों के लिए हफ्ते में एक बार होने वाला time pass है इसलिए फिल्म भी किसी disposable  item सरीखी हो गयी है.… दिमाग घर पे छोड़ के जाइये ,popcorn और ठन्डे आनंद लीजिये और हफ्ते भर से झुंझलाती और outing के लिए ताने मारते बीवी की क्रोधाग्नि पर centralized air conditioner की हवा मारिये कहानी , अभिनय गीत-संगीत जाए तेल लेने

Wednesday, 6 August 2014

चाचा चौधरी और राका
चाचा चौधरी और राका की वापसी
चाचा चौधरी अमेरिका में
चाचा चौधरी और रहस्यमय  चोर
चाचा चौधरी अमेरिका मैं
चाचा चौधरी और साबू का हथौड़ा
चाचा चौधरी और उड़ने वाली कार
पिंकी और झपट जी की पतंग
पिंकी और दादा जी का अखबार
पिंकी और साबुन के बुलबुले
बिल्लू का हंगामा
बिल्लू और बजरंगी पहलवान
बिल्लू  पिकनिक पर ....  आदि और न  कितनी कॉमिक्स के नाम आज भी याद है , बीनी ,साबू , टिंगू मास्टर ,गब्दू ,गोबर सिंह और न जाने कितने किरदार   बचपन की उन सुनहरी यादो के बीच  आज भी जिन्दा है.…
किराये पे कॉमिक्स लाना और आपस में बदल-बदल कर पढ़ना मानो कल की ही बात है

हमारे बचपन में  खुशियां बिखेरने वाले  इन सब के जनक कार्टूनिस्ट  प्राण आज नहीं रहे.…ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और श्रद्धांजलि स्वरुप उनकी एक कृति अपने बच्चो के साथ आज जरूर पढ़े  

Sunday, 3 August 2014

आज हर दिल अजीज अपने किशोर दा का जन्मदिन है , एक फनकार की हैसियत से गजब की शख्सियत थे वो.… मस्ती, संजीदगी और रूमानीपन वाला उनका गायन गज़ब का था और उपर से उनकी उत्कृष्ट अदाकारी सोने पे सुहागा होने का अहसास कराती थी.…वाकई हरफनमौला थे वो

कुछ लोग किशोर दा ,रफ़ी साहब और मन्ना डे  में  तुलना करने बैठ जाते जो मुझे काफी ज़ाया लगती है , ये तीनो ही बेहतरीन है और कोई भी नबर २ या ३ नहीं

विरले कलाकार होते है जो हर किसी  को अज़ीज होते है.… हमारे पिताजी लोगो की पीढ़ी ने उन्हें सराहा , हम लोग उनके फैन है और हमारे बाद की भी जनरेशन उन्हें प्यार करती है.…  यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा और हर गुसलखाने से आवाज आती ही रहेगी  मेरे सामने वाली खिड़की में एक चाँद का टुकड़ा रहता है.…

मेरे पसंदीदा किशोर दा के दस नग़मे

1. http://youtu.be/UULb2pAmz_A
2 http://youtu.be/jVWkTXOPS_0
3.http://youtu.be/ZYhkoq62Vxg
4 http://youtu.be/fUtXdIRvwNo
5.http://youtu.be/Foss-Vs54gk
6.http://youtu.be/IKbakQnafdA
7.http://youtu.be/SRY4oEWaYsk
8.http://youtu.be/Yi_1lqWG1Hk
9.http://youtu.be/Fr-r5NAhOZo
10http://youtu.be/6GDG7E1fUkU

Saturday, 2 August 2014

ये जश्न-ए- आज़ादी है
हर रोज मनाइये
किसी भी तारीख के पाबंध
हम तुम क्यों रहे.… :)

Friday, 1 August 2014

एक ज़माना हुआ करता था, रेडियो में short-wave पर किसी लौ की तरह फाड़-फड़ाती ,ऊपर नीची होती ध्वनि पर हम BBC हिंदी सेवा के समाचार सुना करते थे , प्रस्तुति बहुत आकर्षक होती थी , उत्कृष्ट हिंदी के शब्दों के चुनाव के साथ , वक्ताओं की कर्णप्रिय ध्वनि वाकई समाचार सुनने में एक सुखद अहसास प्रदान करती थी.… 
खबर विश्वशनीय  मानी जाती थी.… ईरान-ईराक खाड़ी युद्ध , operation ब्लू स्टार ,  बाबरी मस्जिद अादि  और न जाने  कितनी महत्वपूर्ण  घटनाओ के समय  सही खबर की ख़ोज में असंख्य  भारतीयों ने टीवी होते हुए भी रेडियो की  ओर रुख किया क्योंकि उस समय दूरदर्शन का ज़माना था ,खबरे सरकारी नियंत्रण में थी.।  

फिर ज़माना आया बाज़ारवाद का याने केबल टीवी का....हर दिन कुकुरमुत्ते के तरह उगते समाचार चैनेल ,गला  काट प्रतिस्पर्धा के बीच  वो ही चिल्ल-पौ मचाने लगे जो अपने-अपने हितो साधने में इनके आकाओ को उचित लगा, खबर का केवल मुलम्मा ही चढ़ा रहा , खेल कुछ और ही होता रहा.… पत्रकारिता किसी हिंदी फिल्म के item सांग सरीखी नज़र आने लगे , जिसमे तड़क भड़क का तड़का था.… असलियत से कोसो दूर 

इसी दौरान विद्व्ता की अपनी ढोल पीटते कुछ चेहरे उजागर हुए जो घर के चूल्हे पे चढ़े पतीले से लेकर अंतरिक्षयान प्रक्षेपण पर अपनी बे-सिर पैर की राय से हमें  प्रताड़ित करने लगे.… 

और अब समय है इंटरनेट क्रान्ति का , सोशल मीडिया ने  जब इस तथाकथित मीडिया की पुंगी बजानी शुरू की तब से इनमें खलबली मची हुई.… आम आदमी को एक सशक्त माध्यम मिला है जिसमे उसने अपनी भड़ास निकलनी आरम्भ कर दी है (जैसा की मै कर रहा हूँ ) .... 

समय रहते सचेत होने से दुर्घटना से बचा जा सकता है.… अभी तो जनता के गुस्से के केंद्र बिंदु सियासत है अगर ये न्यूज़ ट्रेडर्स नहीं सुधरे तो इनको भी हमारे कोप का भाजन बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा