Saturday, 26 March 2016

#प्रेश्या , #खबररंडी , #presstitute यही तो प्रचलित संज्ञाएं हैं ना आजकल हमारी मीडिया के बारे में और हो भी क्यों न इन लोगो का आचरण ही ऐसा रहा है , मोदी सरकार के आने के पूर्व इनकी कोशिश थी कि वो न आ पाए और आने के बाद तो जैसे इनके सीने पर सांप ही लौटने लगे और अब यह इस मंशा से काम कर रहे कि वो चल न पाये ...

खबरनवीशो की एक पूरी जमात जुटी हुई है सामान्य जनभावना के खिलाफ रिपोर्टिंग और ख़बरें प्रसारित करने में , तिल का ताड बनाया जाता है, ताड़ का पहाड़ और फिर उसी पहाड़ पे चढ़कर गोले दागे जाते है , मोदी विरोध का आलम तो यह है कि उसके लिए राष्ट्र विरोध भी मंजूर है , अंग्रेजी पत्रकारिता जिसका दायरा भारत में तो सीमित है का स्तर तो और भी निम्नकोटि का है , कुछ एक चैनल को देख के ऐसा लगता है मानो वो पाकिस्तान से प्रसारित हो रहे हो , अंतर्राष्ट्रीय पटल पे भारत की छवि धूमिल करना ही इनका एकमात्र मकसद है....

किसी भी संस्थान को चलाने का एक अर्थतंत्र होता है , उसको समझिए , उसी को चिन्हित कर प्रहार कीजिये , ये लोग सिर्फ पैसे की भाषा समझते है उसे पे चोट कीजिये ,खाली गुस्सा करने या खिस्याने से काम नहीं चलेगा...

अगर आप किसी न्यूज़ चैनल से इत्तेफाक नहीं रखते तो केवल उसको न देखने भर से आप का कार्य संपन्न नहीं हो जाता , ये भी सुनिश्चित कीजिये कहीं आप उसके लिए अपने केबल या डी टी एच ऑपरेटर को पैसे तो नहीं दे रहे , आपके घर आपके ड्राइंग रूम में आकर आपको मुंह चिढ़ाने वाले पत्रकारों के कार्यक्रम यू ही नहीं बन जाते , उनके पीछे प्रायोजकों का पोषण होता है , ऐसे प्रायोजकों के पहचानिए और उनके सामान का बहिष्कार कीजिये , उन उत्पादों को अपनाइए जिनका आपके दिल को जलने वालो से कोई गठजोड़ नजर नहीं आता , उपभोक्ता आप है और इस बाजारवाद चुनने की शक्ति आपके हाथ है ,आप सर्वशक्तिशाली हैं.... आमिरखान और शाहरुख़ खान के उदाहरण आपके सामने हैं , गंद फ़ैलाने का खामियाजा जब पैसो के रूप में भरा तो कैसे मिमयाने लगे....

अंगेजी भाषा के अख़बार जो अपने शीर्षकों और मुख्य पृष्ठ पे जगह देने के लिहाज से हमारे राष्ट्र और राष्ट्रभावना के लिए तंगदिल नज़र आते है उनको उपयोग पढ़ने के लिए नहीं टॉयलेट के टिश्यू पेपर की तरह ही करे और इस भ्रान्ति का त्याग करे कि अंग्रेजी का अख़बार और न्यूज़ चैनल बच्चों की अंग्रेजी अच्छी करने के लिए जरुरी हैं इसके लिए और भी बतरे श्रेष्ठ तरीके हैं उन्हें अपनाए , चली आ रही गलत मान्यताओं के त्याग का समय है , अंग्रेजी सुधारने के चक्कर में संस्कारो को प्रदूषित न होने दे....

समाज में हो रही घटनाओं पे अपने दृष्टिकोण के समर्थन और पोषण हेतु इस दलाल मीडिया से आशा न रखें, वो हर हाल में अपना एजेंडा ही चलाएंगे , घटनाओं को उसी तरह से दिखाया जायेगा जैसे उनके आका बताएँगे , इन सब को देख और सुन अपना दिल न जलाए , अपनी बात कहने और भड़ास निकालने के लिए सोशल मीडिया जैसा सशक्त माध्यम का इस्तेमाल करें , मुखर हो पुरजोर तार्किक तरीके से अपनी बात रखें ,सत्य को परेशान किया जा सकता है पराजित नहीं...

घर के सात्विक खाने का आनंद लें रोज ज्यादा चटपटा खाने से हाजमा ख़राब होने का भय रहता , ८ से ९ काम से काम एक घंटा दूरदर्शन समाचार जरूर देखें , मुल्क में बहुत कुछ उम्दा भी हो रहा है.....

जो दिखता है वही बिकता से उलट , जो बिकता है वही दिखता को समझिए , अपने अंदर मौजूद उपभोक्ता की हनुमान रूपी शक्ति का जगाइए , एक बार बस ठान लीजये ये खबर व्यापारी आपका चरण वंदन न करें तो बताईएगा ...

Thursday, 17 March 2016

लकड़ी को खोजती बच्चो की उत्पाती टोली
होलिका दहन की तैयारियाँ जोरो से होती
गुप्ताजी के घर चंदे पे चकल्लस है
२१ ,५१ ,१०१ के शोर में रस ही रस है....

बगल के मुहल्ले से कड़ी प्रतिस्पर्धा है
अपनी ऊँचे हरे बांस का ही हो- हल्ला है
सुतली पे लई से चिपके तिकोने लहरते हैं
पुरानी खटिया की चोरी पे शर्माजी बिदकते है....

आंटी लोगो का दल गुजिया-पापड़ में व्यस्त है
रस्तोगी जी का हुआ ,अब रुख पंत जी के घर है
खोलते तेल में तलती मठरी की सुगंध लाजवाब है
मुँह में पानी और दिल चखने को बेताब है....

माँ ने थोड़ा धीरज धरने को कहा
पर जिद्दी यह बालमन अपनी पे अड़ा
गरमा-गर्म पकवान जो मुख में धरे
जीभ-जलने पे फ़ौरन फूं -फूं करने लगे ....

स्त्रियों के सामूहिक श्रम से उपजा ये स्नेह निश्छल हैँ
मिलके उत्सव बनाने में कितना अपनापन है
गीत ,हंसी-ठिठोली ,छेड़छाड़ तो कभी खुसर-पुसर है
फाल्गुन के मस्ती का सब पे असर है ....

घर के ड्राइंग रूम में बैठकी होली सजी है
फर्श पे दरी गद्दे के ऊपर ,जाजम -चाँदनी बिछी है
सोफ़ा ,मेज कुर्सी ,टेबल बाहर गैलरी पे पड़े हैं
आस-पड़ोस के बच्चे उनपे बेफिकर कूद रहे हैं....

हर अतिथि के माथे अबीर ,गुलाल से तिलक है
सत्कार में सौंफ, मिसरी, छोटी इलायची प्रस्तुत है
चूल्हे पे बड़े से भौगोने में ढेरों चाय चढ़ी है
पकौड़ो के लिए घुले बेसन में माँ की अंगुलियाँ सनी हैं...

फाल्गुन के गीतों में शास्त्रीय संगीत की प्रधानता है
बजता हारमोनियम , और तबला इसमें जान डालता है
मिलती दादो के बीच गायक लंबा सुर तानता है
कितनी फरमाइशें, दिल एक से कहाँ मानता है ?

खुशनुमा बदलता मौसम ,त्यौहार के लिए मस्त है
केवल एकदिन का जश्न नहीं , हफ्तेभर का बंदोबस्त है
गिले-शिकवे भूल , सबसे गले मिलने पर जोर है
भंग की मस्ती में हर छोटा बड़ा गुनाह ना काबिल-ए-गौर है....

स्कूल से होली की छुट्टियों के पूर्व का आंखिरी दिन
सख्त चेतावनियों के बावजूद तैयारियाँ विभिन्न
बस्ते के एक कौने में छिपाया रंग और गुलाल
बस छुट्टी की लंबी घंटी का बड़ी ही शिद्दत से इन्तेजार...

गाल , बाल,यूनिफार्म, मौजे सब रंग में सने
छीनाझपटी में तुरपन उधड़ी ,कुछ बट्टन टूटे
सफ़ेद कमीज पे पक्के रंग के दाग से डरे
घर पे मम्मी के गुस्से का सामना हम कैसे करें ...
सहपाठिन को कैसे लगाये रंग थोड़ी हिचकिचाहट
देख़ो अनायास बंध टूटे जो देखा उसने मुस्कुराकर
कोमल गालो पे होले से हम अबीर मलने लगे
नव यौवना का स्पर्श पा अंदर तक सिहर उठे

आज रात्रि होलिका दहन का प्रोग्राम है
सबको देर रात्रि तक जगाने का इन्तेजाम है
VCR पे लगातार दो पिक्चर देख तीसरी पे जुटे
आती नींद बावजूद आँख मिचमिचाते वहीँ डटे

देर रात्रि होलिका जलने से पूर्व सबको जगाया
खाली कंटर पीटा ,दरवाजे का कुंडा जोरो से बजाया
कोई सोता रहा तो कोई निकल बाहर आया
कर्मठ कार्यकर्ताओं ने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया

विधिवत पूजा-अर्चना उपरांत होलिका जली
बुराई पे अच्छाई की जीत बड़ी धूम-धाम से मनी
ईख पे गेहूं की बालियाँ लगा आग में सेकते हैं
प्रजव्ल्लित अग्नि की प्रदिक्षणा कर आशीर्वाद लेते हैं

बूंदी के दो-दो लड्डू प्रसाद में बटे
लौड़-स्पीकर पे होली के गाने जोरो से बजे
अबीर गुलाल जम-जम के उड़े
थके हारे सब थोड़ी देर सोने चले

प्रातः हम लोग थोड़ी देर से जगे
रंग वाली होली की तैयारियों में लगे
कडुआ तेल पूरे शरीर में अच्छी तरह पोता
सड़क से जल्दी आ गया होली खेलने का न्योता

सभी संगी साथी आपस में भिड़े
सफ़ेद कुर्ते पैजामे पे हर पड़ता रंग खिले
जमकर मचाया होली का हुडदंग
न शराब की जरुरत और ना ही पी भंग

हर आते जाते पे पानी की बौछार है
पिचकारी की धार , गुब्बारे की मार है
हर अजनबी से होली है की पुकार है
भूख लगने पे गुजिया की दरकार है

दिन भर होली की खूब मस्ती रही
कभी चिप्स पापड़ सूते , कभी बड़ा-दही
मुहल्ले का हर आंगन अपना से लगे
बचपन चलता रहे न हो कभी बड़े...

दोपहर हुई सूरज चढ़ आया
मम्मी ने बस करो का फरमान सुनाया
बाथरूम में नहाने के लिए गर्म पानी मिले
चेहरे का रंग छुटाने में पसीने छूटे

नहा धो जैसे ही बाहर निकले
कुछ साथी पोत गए आकर फिर से
कहाँ तुमने खेली हम संग होली
हमारा हक़ भी बनता हम हैं हमजोली

त्यौहार बीता खूब रहा धमाल
अब सारे हंगामे होंगेअगले साल
शाम को होली मिलन में जायेंगे
हर मिलने वाले को दिल से गले लगायेंगे

क्यों बड़े हुए क्या मिला बड़े शहर आकर
फ्लैट में अजनबियों सी जिंदगी बिताकर
कोई न मिलता यहाँ खुद से आकर
चार पैसे कमाये अपनापन गंवाकर

हर साल हर होली मेरा दिल जलता है
होलिका के खजूर के अधजले बूटे सा सुलगता है
गम को स्कॉच व्हिस्की में घोलता हूँ
नशे में खुद को भूलने की कोशिश करता हूँ

त्यौहार अब दिल से नहीं मनाता
औपचरिकता पूरी करने के बाजार से गुजिया ले आता
होलिका जले देखे जमाना गुजर गया
तरक्की के इस खेल में कितनो से कट गया....

पुराना बचपन रह रह के याद आता है
दिल के किसे कौने में पड़ा मासूम बच्चा झटपटाता है
बार बार मन उसी पुरानी होली के लिए मचलता है
खुद के बनाये जाल से देखे कौन पहले निकलता है.....

Saturday, 2 January 2016

पुराना नया साल ....

दूरदर्शन का प्रोग्राम
देर रात्रि जगने के इन्तेजाम
पिताजी का पढाई का  उलाहना
पर कान पे जूं जरा भी न सरकाना
बंदिशों में थोड़ी छूट पाना
नींद भगाने के चाय बनाना
और रजाई के सफ़ेद खोल पे दाग लगाना

बस बारह बजने का इन्तेजार
शगुन के लिए किताब उठाने को तैयार
जो काम सबसे पहले  नए साल में करेंगे
साल भर वोही तो करते रहेंगे ...

वो थोड़े बहुत ग्रीटिंग कार्ड
खुशियाँ दे बेशुमार
घर की बैठक में  दीवार पे लटकाए
पीछे लिखे दामों को
बार-बार बस देखते जायें
सीमित साधनों में
सादगी से मनते उत्सव सच्चे थे
चकाचौंध विहीन समय के
हम सीधे साधे बच्चे थे ...

न पैसे,वैभव ,ऐश्वर्य का
खुलम-खुल्ला दिखावा
पिताजी का कोट छोटा करा के
पहले भाई फिर मैंने पहन डाला
दो अदद पतलून में १२ वी तक निभाया
ढ़ीली पडी इलास्टिक ने
पहनी जुराबों में फूल सा खिलाया
जूते यूहीं ही नहीं आ जाते थे
मोची जवाब दे दे तब पिताजी नए लाते थे...

अभाव तो नहीं , अति भी नहीं
अनुशासन और बचत का बोलबाला था
बचपन से अभिभावकों ने
ये ही संस्कार डाला था
मितव्ययी होने और
चीजो के  इष्टतम उपयोग की सीख थी
बच्चों के  चरित्र निर्माण की पक्की नीव थी....

आज के बचपन से मुझे शिकायत नहीं
भटकाव के दौर में कोई हिदायत नहीं
हम बस पैसे कमाने में ही  जूझे रहते
समय की कमी को उपहारों से भरते
हमने ही उन्हें चीजों का आदि बनाया
बचपन घर पे पड़ा रहा
बाहर न निकला और मुरझाया ....

Sunday, 29 November 2015

दूध का भरा गिलास....

माँ स्टडी टेबल  पे दूध का भरा गिलास रखते हुए बोली - ज्यादा नखरे मत दिखा ,इसे चन्न करके पी जा,बढ़ते बच्चो के लिए रोज दूध पीना जरुरी है , दूध नहीं पीयेगा  तो ठिगने का ठिगना रह जायेगा ....

किताबों से क्षण भर के लिए नजर हटाते हुए मैंने बड़े ही अनमने ढंग से दूध से भरे  हुए उस स्टील के गिलास को देखा , उसके ऊपर उठती हुई हलकी-हलकी भाप उसके गरम होने का अहसास करा  रही थी  पर सतह पर जमी पतली सी मलाई की परत मुझे उबकाई भी दिला रही थी .....

बचपन में दूध पीना मुझे कतई भी पसंद न था , श्वेत रंग के बेस्वाद से लगने वाले  इस पेय पदार्थ को कंठ से नीचे उतारना नितांत ही दुरूह कार्य था इसलिए इससे बचने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे जाते , बहुत गर्म /ठंडा होने के बहाने बनाए जाते , चीनी कम-ज्यादा होने बेजा शिकायते की जाती , पेट भरे होने और तिल भर भी जगह न होने के तर्क दिए जाते, मलाई हटाने को कहा जाता  और माँ  हमारी  इन सारी  उटपटांग मांगो को पूर्ण करने के लिए रसोई और कमरे के  बीच नाचती ही  रहती और अगर इन सब के बावजूद भी हमारा बाल हठ जारी रहता तो उनकी पिताजी से शिकायत कर देने की धमकी एक ब्रह्मास्त्र का कार्य करती जिसका वार कभी भी विफल न जाता ....

वैज्ञानिक विश्लेषण से परे यहाँ अनुभवों के आधार पे उसे दूध के एक सम्पूर्ण आहार होने के इल्म था , गाय या भैस के होने पे विवाद न था पर पूर्णरुपेण शुद्ध होना उसके स्वीकार्य होने एकमात्र  कसौटी थी , पानी के अलावा किसी अन्य दूसरी चीज के  मिलने से उसके अशुद्ध या कृत्रिम होने के बारे में उस समय सोचा भी नहीं जा सकता शायद मानव का नैतिक और चारित्रिक पतन आज के दर्जे का ना था ...बच्चो को गिलास भर दूध पिलाने के बाद मातृत्व का वो संतोष अगाध था , उसकी शांत जुकड़ी  अब तल्लीनता के साथ घर के अन्य कार्यो में रम सकती थी ....

खाद्य पदार्थो के चुनाव में सबसे ज्यादा तरजीह दूध को ही मिलती , बाल्टी लेकर अपने सामने दुहवा दूध लाना पिताजी की प्राथमिकताओ में था , कभी कभार   अगर हमें जाना  पड़ता तो पहले से  दूधिये की चलाकियों के बारे में बताया जाता और सजग रहने की हिदायत दी जाती फिर भी दूधिया चलाकी कर ही देता , दूध के डिब्बे में फेन भरके वो थोड़ी घटतोली कर ही डालता.....

रोज दूध पीने के कार्यक्रम में ड्रामा होना लाजमी था , पर न चाहते हुए भी दूध तो पीना ही पड़ता , तरह-तरह के प्रलोभनो और झिडकियों का दौर जारी रहता , ममता और भयदोहन का क्रम  भी जारी रहता ....

बचत की ओर आसक्त इस मध्यमवर्गी परिवार में दूध में मिला उसकी पौष्टिकता और स्वाद में इजाफा करने का दावा  करने वाले बाज़ार में उपलब्ध डिब्बाबंद  पदार्थो के प्रति रूचि न थी , उनको नकारने के यहाँ अपने तर्क थे जो काफी हद तक सही भी थे , चीनी मिले गर्म दूध को  बिना कुछ मिलाये उसके स्वाभाविक श्वेत रूप में ही सेवन को श्रेयस्कर माना जाता था ....जाड़ो में चीनी जगह गुड का मिलना एक सुखद बदलाव होता था ....

किशोरावस्था के आगमन पे थोड़ी रियायतों का मिलाना लाजमी था , अब रसोईघर में प्रवेश किया जा सकता था , और अपने हिस्से के  मिले दूध में परिवर्तन करने में रोकटोक भी न थी , कभी दूध-पत्ती , कभी घुटी कॉफ़ी तो कभी सेवई बना कर बना मैंने दूध की उस बेस्वादीपन से आंखिरकार छुटकारा पा ही लिया , छोटी इलायची के दानों ने मुझे उस अप्रिय खालिस  दुधैन स्वाद से मुक्त कराने में काफी मदद की ....

पिताजी के विपरीत आज सोते समय मै गिलास भरके गर्म दूध नहीं पीता पर यदा-कदा हलवाई के यहाँ भट्टी पे चढी बड़ी सी लोहे की कडाही पे खोलते दूध के देख पता नहीं मन  क्यों ललचा जाता है?, कुल्हड़ में दूध गरम भी होता है और उसमें मोटी सी मलाई की परत  भी होती है , दूध को पीते -पीते अतीत में  माँ के द्वारा परोसे गए स्टील गिलास की तली में  अधघुले चीनी के  दानो याद हमेशा ही आती रहती  है ....

Sunday, 15 November 2015

पुरानी पेंट रफू करा कर पहनते जाते है
Branded नई shirt देने पे आँखे दिखाते है
टूटे चश्मे से ही अख़बार पढने का लुत्फ़ उठाते है 
Topaz के ब्लेड से दाढ़ी  बनाते है 
पिताजी आज भी पैसे बचाते है ….

कपड़े का पुराना थैला लिये 
दूर की मंडी  तक जाते है
बहुत मोल-भाव करके 
फल-सब्जी लाते है
Packet नहीं अपने  सामने दुहवा हुआ 
खालिस दूध  पोते-पोतियों को पिलाते है
आटा नही खरीदते, गेहूँ पिसवाते है
पिताजी आज भी पैसे बचाते है… 

स्टेशन से घर पैदल ही आते है 
रिक्सा लेने से कतराते है 
सेहत का हवाला देते जाते है 
बढती महंगाई पे चिंता जताते है
पिताजी आज भी पैसे बचाते है ....

पूरी गर्मी पंखे में बिताते है 
सर्दियां आने पर रजाई में दुबक जाते है 
AC/Heater को सेहत का दुश्मन बताते है 
लाइट खुली छूटने पे नाराज हो जाते है 
पिताजी आज भी पैसे बचाते है

माँ के हाथ के खाने में रमते जाते है 
बाहर खाने में आनाकानी मचाते है 
साफ़-सफाई का हवाला देते जाते है 
मिर्च, मसाले और तेल से घबराते है 
पिताजी आज भी पैसे बचाते है…

गुजरे कल के किस्से सुनाते है 
कैसे ये सब जोड़ा गर्व से बताते है 
पुराने दिनों की याद दिलाते है 
बचत की  अहमियत समझाते है 
हमारी हर मांग आज भी 
फ़ौरन पूरी करते जाते है 

पिताजी हमारे लिए ही पैसे बचाते  है ...

Friday, 6 November 2015

क्यों सोचे तुम्हारा मन मेरी तरह
क्यों हो मेरी हर पसंद तुम्हारी भी रूचि
क्यों बताऊँ मै तुम्हे आचरण और सलीके
क्यों ढलो तुम मेरी इच्छाओ के अनुरूप  यूँही

क्यों तुम्हारा ही दायित्व रहे परिजनों के प्रति
और मै पाता  रहूँ सम्मान अछिन्न
क्यों तुम्हारा  इंकार लगे बगावत का  स्वर
और मेरी मर्जी चले हर दिन

क्यों तुम्हारे तर्क भी लगे कुतर्क
और मेरी अपरिपक्वता उचित
क्यों मै चाह के भी स्वीकार न  पाऊं अपनी त्रुटि
और तुम बिन कुछ किये हो जाओ अभियोजित

तुम भी तो मेरी ही तरह सक्षम
फिर बार-बार घिसो क्यों तुम ही
क्यों हर निर्णय में निर्णायक बनू मै
और तुम प्रदान करो  अपनी स्वीकृति

सभवतः बचपन से आजतक
इस पुरुष प्रधान तथाकथित सभ्यसमाज ने
सदैंव रोपित और पोषित किया मुझमें
सर्वोपरी और श्रेष्ठ होने का भ्रम...

Tuesday, 3 November 2015

आज का दिन हम सबके लिए  बेहद खास है 
सबकुछ अच्छा होगा इसका प्रबल अहसास है 
पिताजी के मामाजी के घर ये आयोजन है 
लड़का-लड़की को एक दूसरे से मिलाने का प्रयोजन है 

फल -मिठाई मेवे सब के सब मेज पे सजे हैं 
विविध प्रकार के पकवान भी आज घर पे बने हैं 
नाते-रिश्तेदारों की सीमित चहल पहल है 
शुरुआत हैं , बात बिगड़ जाने का भी तो  डर है 

सबके नयन प्रतीक्षारात घर के गेट पे टिके हैं 
कान भी हर आहट को सुनने की कोशिश करने लगे है 
वक्त देखों अब काटे नहीं कटता है 
कुछ याद आने पे भईया झट माँ के पास दौड़ पड़ता है 

दीदी की साड़ी पहनने से न नुकुर है 
इस दुविधापूर्ण क्षण में कैसे संभलेगी इसका डर है 
बड़े-बूढों के परामर्श का न उसपे  कोई असर है 
झट आंसू टपका देती , ये कन्या आज बड़ी नर्वस है 

चाय की ट्रे ले जाने में भी असमर्थ है 
ले गई तो पक्का गिरेगी , बहस करना व्यर्थ है 
कह रही मुझे बार-बार टोक के और न हडबड़ाओं 
क्या करना क्या न करना मुझे और न बतलाओ 

पहली बार फंसी इसमें तुम सबके कहने में 
क्या मै अखरने लगी थी साथ रहने में 
उन्मुक्त जीवन मेरा, जिम्मेदारी विहीन था 
कॉलेज और हॉस्टल जीवन जीवंत और रंगीन था 

खीचतान ,नोकझोक के मध्य आंखिर वो समय आ ही गया 
लड़का अपने लाव-लश्कर के साथ देखो घर पधार  गया 
खुसर-पुसर और कानाफुसियों के मध्य कितना संकोच है 
नये बनते संबंधों में शुरूआती तकल्लुफो का ही जोर है 

इस विचित्र से सन्नाटे को लड़के की भाभी ने तोड़ा 
परिचय कराते हुए हमारी दीदी से मुस्कुराते हुए बोला 
चाय की चुस्कियों के बीच औपचारिक वार्तालाप है 
दो परिवारों का यह मिलन कितना खास है...

अरे बेटा तुमने तो कुछ खाया ही नहीं 
तुम्हे क्या पसंद है तुमने तो बतलाया ही नहीं 
शर्म झिझक से भला किसका भला हुआ 
मुस्कुराते हुए चाची ने लड़के को छेड़ दिया 

माँ ने झट धर दिए संभावित दामाद की प्लेट में 
एक गुलाब जामुन दो समोसे 
अविरल बहती बातों की इस चासनी के मध्य 
कोई न भी तो कैसे बोले ...

बातों के बीच अक्सर उठता हंसी ठठा है 
वर्जनाए लगी टूटने , संबंध अब आत्मीय लगता है 
केवल लड़का-लड़की खामोश पड़े लजाते है 
बरबस मिल जाते नयन और होठ काट मुस्कुराते है 

शोर अब थम गया , 
फिर से सन्नाटा छा गया 
लगता है लड़का-लड़की के 
एकांत में बातें करने का वक्त आ गया 

बारी-बारी सब उठ खड़े 
इधर-उधर हो लिए 
भाभी जी मुस्कुरा के कहें 
बोलिए जी अब खुल के बोलिए 

बड़ी ही अजब स्थिति आज यहाँ बनी है
संभावित सात जन्मो के संबंधो की शायद नीव पडी है
प्रारंभिक हिचकिचाहट से पार पा
ये जोड़ी अब आपस में बोल पड़ी है
पसंद-नापसंद सब कह डाले
बहुत सी बातें फिर भी कहने को  बची हैं ...

समय बहुत  जल्दी बीता , ढेरों  हुई बात
असंख्य यादें संजोयगी इनकी ये पहली मुलाकात
माँ ने खटखटाए किवाड़ कहा खाना लग गया
बेटी का खिला-खिला चेहरा उसे कितना जच गया


भोजन उपरांत फिर से चाय का दौर है
दीदी अलग कमरे में ,दिमाग पे बहुत जोर है
हाँ करूँ के न करूँ अभी खुलके समझ न पाऊँ
असमंजस की इस स्थिति अभी निर्णय से घबराऊँ

तभी आया सन्देश लड़के वालों को लड़की पसंद है
दीदी की चिंता और बड़ी मन में अनेको द्वन्द है
माँ ,पिताजी ,बाबा दादी सब लगे उसे समझाने
घर बैठे आये इस बढ़िया रिश्ते को हाथ से न देंगे जाने


इतने लोगो के हां कहने पे वो भी साथ चलदी
पलके झुकाते हुए धीमी आवाज में उसने भी हामी भर दी
पिताजी के ननिहाल अब जश्नों का दौर है
मुबारक हो मुबारक हो का देखो मच गया शोर है ....