Friday, 22 August 2014

अच्छे -बुरे का भेद एक व्यापक चर्चा का विषय है। देश , काल ,रीति और समाज के अनुसार ये परिभाषित होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। हमारी हिन्दू सनातन धर्म के परंपरा के अनुसार मांस- मदिरा का सेवन हमेशा से ही बुरा और निषेध माना गया है और इसके लिए किसी दिन या महीने के कोई विशेष छूट नहीं। समय के अनुसार लोगो की खान-पान की आदते बदली है और नई पीढ़ी तो हमेशा से ही प्रयोगात्मक रही है। स्वनिर्मित ये अल्पकालिक निषेध शायद उस अपराधबोध को कम करने में थोड़े बहुत सहायक होते है जो हमें इन वर्जित माने गए  कार्यो को करने के बाद  होता है … और भईया Liver भगवान ने एक ही दिया है उसे भी तो थोडा बहुत आराम चाहिए ना 
बात कानपुर के कॉलेज के दिनों की है.… sale से एक सफ़ेद अंगूरा का स्वेटर ले दीवाली पे पिताजी को भेंट किया। पिताजी ज्यादा brand conscious  न तो पहले थे न अब  है पर उस समय woolmark के निशान को देख बस इतना समझ गए कि यह गरम तो जरूर होगा (पहाड़ी आदमी को ऐसी ही चीजों की तलाश रहती है) …

काफी कहने और बढ़ते जाड़े में एक दिन वे उसे पहनकर विद्यालय चले गए। स्वेटर को देख साथी अध्यापकों (जो कि उनके स्वाभाव और आदतों से भली-भांति परिचित थे ) ने कहा.… प्रिंसिपल साहब ये कहाँ से  से ले आये? , आपने तो पक्का नहीं ख़रीदा होगा , बहुत महंगा है जरुर बेटे ने दिया होगा...

अगली छुट्टियों पे जब दोबारा घर पंहुचा तो देखा के  पिताजी ने वो स्वेटर ,वापस मोमजामे की पन्नी चढ़ा कर ,सहेज कर वापस डिब्बे में रख दिया है.… मेरे ऐसा पूछने पर वे बोले .... काफी कीमती है, इसलिए संभाल  के रखा है.… कभी-कभार विशेष मौको पे ही निकलता हूँ...

इस घटना के लगभग 13 वर्षो बाद , पिछले वर्ष जब में घर पहुँच एकाएक बड़ी ठण्ड पे जब मैंने उनसे स्वेटर माँग की  तो उन्होंने उसी को लाकर मेरे सामने रख के मुस्कुरा के बोले... ले तेरा ही लाया हुआ तुझको दे रहा हूँ

गजब की क्षमता है हम से एक सिर्फ एक पीढ़ी पहले के लोगों में चीजों को सहेज के रखने  और मितव्यता की जिसे हम अक्सर कंजूसी कह के हास-परिहास में उड़ा देते है.....

घर में लगे  सामान के अंबार बावजूद हर दिन कुछ न कुछ खरीदने की खुजलाहट की बीच कभी- कभी जरूर ये ख्याल आता है.… काश ईश्वर  हमें भी वो ही सलाहियत बख्श  देता …

वैसे अब भी वो स्वेटर मेरे पास है पर हालत काफी खस्ता है....

फिर से इंतेखाब का वख्त है
छूटेगा कोई इसकी कशमकश है

शायद जो मुनासिब हो नसीब हो हमें
मुश्किल वख्त इम्तिहान सख्त है 
नग्नता में  सृजनात्मकता तलाश …  कुछ लोगों  की हमेशा से ही ये ही कोशिश रही और वे इस पे वाद-विवाद करने के लिए हमेशा ही आतुर रहते है.… अपने को सही साबित करने की इनकी मशक्कत पहले भी थी और आज भी है.… अब ये PK भी इससे ज्यादा और कुछ नहीं।।। फिल्म बॉक्स आफिस पे हिट हो जायेगी और इनका किया हर  अनुचित कार्य उचित।।।। जब सिक्के की खनक ही सफलता और सही-गलत का मांपदंड हो जाये तो इन जैसे लोगो से आशा रखना सिंधु में मीठे जल तलाशने जैसा ही है


हर सियाह यहाँ पे  सफ़ेद है 
 अपनी मौजूदगी पे हमें खेद है 

हक़ हलाल की बातें बेमानी 
छीनने में कब किसे गुरेज है 

लानत मिल रही है अपनी तरबियत पे 
क्योंकि हमें बेमानी से परहेज है 

क्या नेता क्या नौकरशाह  
यहाँ तो अदना चपरासी भी सेठ है 

सबने मिलके बना रकखी चौकड़ी 
खींचतान, बन्दर बाँट का खेल है 

जमीर मर चुका है कितनो का यहाँ 
जिनमे बाँकी  वो तो मटियामेट है 

बचा लो इस मुल्क को नौजवानो 
तुम से ही उम्मीद  अब शेष है 





पहले खूब  भाता था कितनो को
पर अब  कितना  अखर  गया  हूँ
मै जो मुख़ालफ़त पे   उतर गया हूँ

हर दिन मुझे रहती है  कोई   शिकायत
लोग कहते है  हद से गुजर  गया हूँ
मै जो मुख़ालफ़त पे   उतर गया हूँ

अल्फ़ाज़ अब न रहे चासनी सरीखे
सच की कडुवाहट में घुल गया हूँ
मै जो मुख़ालफ़त पे  उतर गया हूँ.…

यार-दोस्त ,नदारद है आसपास से
गलत को सही कहने से मुकर गया हूँ
मै जो मुख़ालफ़त पे  उतर गया हूँ.…






















दोस्ती

अपनी दोस्ती का जश्न मनाने के लिए क्या हमें कोई तारीख मुकर्रर करने की जरुरत है ? भइया हम तो रोज मनाते है और जमकर मनाते है.… 

ईश्वर ने नेक माँ-बाप दिए , लाड करने वाले भाई बहन , सबसे पुराने,पक्के और सच्चे दोस्त आज भी वही है.… हमारे पिता थोड़े सख्त मिजाज के थे , उस समय प्रचलन भी वैसा था , होते हुए भी बच्चों से स्नेह का खुल्लम-खुल्ला प्रदर्शन प्रायः पिता नहीं किया करते थे पर इसकी भरपूर भरपाई माँ के द्वारा कर दी जाती थी.… , हमारी गलतियों ,शैतानियों ,परेशानियों ,जरुरतो और गुस्से का पहला ठिकाना वो ही थी ,माँ कवच की तरह होती थी, हर विपदा में रक्षण उसी से प्राप्त होता था.…

अच्छे संस्कार मिले ,पढ़ लिख के अल्लाह मियां की गाय की तरह कॉलेज पहुंच गए.… बस यहीं से लाइफ ने एक जबरदस्त यू-टर्न मारा। अपनी क़ाबलियत सिद्ध होने के तमगे साथ-साथ एकाएक आज़ाद माहौल मिला, सुबह के संडास से लेकर रात के २ बजे की चाय के बीच हर छोटी बड़ी चीज हमारे लिए नई थी.… और हमारे साथ पहली बार जिस किसी ने इनका अनुभव किया वो कमीने दोस्त ही जिंदगी की कमाई हुई सबसे बड़ी दौलत है और हमारे सबसे बड़े राजदार भी...

कौन सा दिन नहीं जब ये ससुरे याद नहीं आते , इन्हे गरियाने,लतियाने का मन नहीं करता, बस बंधे रहते है कुछ खुद की बनाई हुई मजबूरियों से और काफी समय यूँ ही गुजर जाता है इन से मिले और बात किये हुए.…

और जब कभी सोमरस के आधिपत्य में बहुत खुश और Senti हो जाते है तो फ़ोन पे चिल्लाकर देर तक बात करके इन्हे अपने होने अहसास करा देते है.… फिर से मिलने के वादो के बीच हम फिर से मशगूल हो जाते है अपने अपने उन्ही रोजमर्रा के कामो में.…

शादी के बाद बीवी से आस रहती उन्ही कमीनो के थोड़े बहुत अंश की जो पूरी न होने पर अक्सर हमारे बीच एक न खत्म होने वाली बहस का कारण बन जाती है.....