Friday, 29 August 2014

गुनाह  तो जगजाहिर है
पर मुलव्वस बड़ा माहिर है
खबरों में खबर नहीं
कायम रहती सियासी रंगीनियाँ
और हम तुम करते
सिर्फ कानाफूसियाँ

Thursday, 28 August 2014

अपना कालेज कई मायनो में विशिष्ट था , है और आगे भी रहेगा....

न जाने कितनी पीढ़ियां निकल गयी इन BH-1 ,BH-2,BH-3, BH-4 , GH और BH-5 ( हमारे ज़माने में  नहीं था ) से पढ़कर , बस समय बदला ,चेहरे बदले ,प्राथमिकतायें  बदली पर किसी भी काल खंड में हम 'GANESHIANS' की फितरत न बदली ।  मेधा  ,मस्ती और उज्जड़पने की त्रिवेणी सदैव ही कायम रही और यही बात हम सबको आपस में जोड़े रखती है…

मोटे तौर पे हॉस्टल के दिनों में हम लड़के दो भागो (Groups ) में विभाजित थे , एक जो दारू पीते थे और दूसरे जो नहीं पीते थे.....

न पीने वाले highly  image conscious लोगो  की श्रेणी में आते थे , इन्तेहाँ नज़ाकत और नफासत पसंद... इनका हर एक काम GH को अपने जेहन में लेके होता था । साफ़-सुथरे,नहा धोके ,समय से सुबह 8 बजे वाले lecture में पहुँचना , front row में बैठना , टक-टकी लगाये प्रोफेसर साहब को देखना , तीन-चार रंगो की  कलमों   (Pens )और   शदीद मशक्कत के साथ गुरूजी के द्वारा बोली और black board पे लिखी हर बात नोट करना जैसे वो कोई ब्रह्मवाक्य हो इनकी रोज की आदत में शुमार था.… 

हर पूछे  सवाल पे तुरंत अपना हाथ रूपी एंटीना खड़ा कर देना , और ऐसी कोई हरकत करना जिससे सबका ध्यान इनकी और आकर्षित हो और जवाब  देने के बाद वो विश्व-विजेता वाली चमक इनके चेहरे पे देखने लायक होती थी.… Lecture के बाद जब तक ये किसी बालिका से लस न ले इनका सुबह का नाश्ता  हजम नहीं होता था.… 

इन लोगो का कमरा हमेशा व्यवस्थित रहता था , बिलकुल सफाई से,बिस्तर के पीछे  लगा बिना सिलवटो वाला  प्लास्टिक  वॉल पेपर, उसके ऊपर पीतल की चौड़ी drawing pins से ठुकी black ribbon , सलीके से सजी study table और उसके ऊपर चमचमाता  टेबल लैंप और emergency light , करीने से रखी किताबे ,घर-परिवार, देवी देवताओं की फोटो आदि-आदि ..... कितना विहंगम दृश्य प्रदान करती  थी .… 

इनके पास हमेशा घर से आये लड्डू,मठरी ,देशी घी व अन्य खाद्य सामग्री प्रचुर मात्रा विद्यमान  रहती थी  पर इनकी हर जरुरी चीज ताले में बंद रहती थी और आप इनसे कुछ भी मांगने की गुस्ताखी नहीं कर सकते थे, अगर गलती से आप से ये गुनाह हो गया तो ये अपनी लानत भरी नज़रो से आपको ये जता देते थे कि आप से बड़ा भिखमंगा इस जहान में कोई दूसरा कोई और  नहीं  …

ये लोग व्यवस्थित थे पर सीमित थे , इनके दोनों सिरे आसानी से प्रदर्शित हो जाते थे.… 
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और दूसरा group था पीने वालो का ....धर्म, जाति ,शहर , स्कूल , पारिवारिक पृष्टभूमि , juniority, seniority का फर्क यहाँ नदारद था.… RUM में रमे ये लोग ख़ुदपरस्त नहीं खुदा-परस्त थे 

भेद को मिटा देना उस मालिक की सच्ची इबादत है और ये लोग इस कला में माहिर थे.… 

जो सोये ही रात के तीन बजे उसके लिए सुबह के  lecture के क्या मायने ?   Proxy के सहारे इनका  वजूद कायम था.… 

ये लोग कॉलेज और कानपुर की नस-नस से वाकिफ थे , हर छोटी ,बड़ी घटना पे इनकी सटीक और पैनी नज़र होती थी  , संगठन में शक्ति वाली कहावत  को ये लोग ही अपने पौरुष से चरितार्थ करते थे....
GSVM में होने वाले हर छोटे बड़े आयोजन का भार इनके कंधो पे ही होता था और ये लोग बख़ूबी उसे अंजाम भी देते  थे.… 

ये लोग BH के इतने आदी होते थे कि इन्हे GH जाने की आवश्यकता ही नहीं   थी , सलीको में सिमटजाना इनके मिज़ाज में  था ही नहीं  … 

कमरा भी बेतरतीब सा फैला रहता था , इधर ,उधर पड़े  कपडे , किताबे, cassettes, हवा में मौजूद जले तम्बाकू की गंध ,  फ़िल्टर सिगरेट के थूड्डो से लबालब स्टील की कटोरी  ,कपड़ो ख़राब करता दीवारो से  छूटता हुआ रंगीन चूना, उखड़ते हुए हसीनाओं के फड-फडाते  पोस्टर  ,कमरे के बाहर नाश्ते और खाने की औंधे मुँह गिरी हुई  प्लेटे/गिलास   और न जाने क्या -क्या  इन लोगो की  बहुमुखी प्रतिभा के विभिन्न रंगो को प्रदर्शित करता था.… मजाल है के आप इनके इस तरह से  बिखरे हुए व्यक्तित्व का कोई सिरा तलाश कर  पाए , ये सीमओं से परे था , असंख्य संभावनाए लिए … 

कमरे की कोई भी चीज ताले के सुपुर्द नहीं ,  अगर आपको किसी भी चीज की जरुरत हो , पूछने की जहमत ना कीजिये बस उठा के ले जाइए , इन्हे कोई मसला नहीं पर हाँ   काम हो जाने के बाद शराफत से उसे वापस रख दीजिये वरना गाली खा के तो आप को रखनी पड़ेगी ही .... :)

image build  up की जगह ये खुद अपनी image destroy करने पे ज्यादा यकीं रखते थे और हो  भी क्यों न सम्पूर्ण विनाश ही तो नव-सृजन की पहली शर्त है.…  

संबंधो शर्त कैसी ? कोई पसंद  है तो उसे वैसे ही पसंद कीजिये जैसे कि वो  है , बिना किसी लाघ-लपेट के या मीनमेख निकाले.... नए सबंधो को स्थापित करने में यदि दिमाग लगाओगे तो हर दिन फायदे नुक्सान के हिसाब में ही मसरूफ रहोगे और चीजें अगर दिल से तय होंगी तो प्यार और विश्वास हर दिन परवान चढ़ेगा  .... 

जिंदगी में अनेक मुकाम हांसिल होंगे , बात तो बस उनको हांसिल करने के सफ़र की है ,संजीदा रह के करोगे तो राह कठिन लगेगी, मस्त-मौला रह के करोगे तो दुश्वारियों का पता भी नहीं चलेगा ...


उम्र के  चौथे दशक की और बढ़ते हुए, पुराने दिन और याद आने लगे है , काफी समय गुजर गया  ज़िन्दगी और carrier के बीच सामंजस्य बैठाते हुए.… ये कभी न ख़त्म होने वाली जद्दोजेहद आगे भी जारी रहेगी ...
अपने कॉलेज के दिनों को याद करके  कुछ सुकूं हांसिल करने में हर्ज़ ही क्या है ? मै तो एक लम्बे अरसे से कर रहा हूँ , आप भी कीजिये 












Saturday, 23 August 2014

अक्सर पूनम और मेरे बीच बहस का एक मुद्दा होता  है  "कानपुर" .... हर बार की तकरार में वो हमेशा कहती रहै पता नहीं क्या है तुम्हारे इन कानपुर मेडिकल कॉलेज के दोस्तों में  जो तुम इनके पीछे बौराय हुए घूमते रहते  हो.… अगर कोई कनपुरिया घर आज जाए तो तुम अपनी सुध-बुध ही खो देते हो और तुम सब मिलके घंटो तक कानपुर -कानपुर की ही रट लगाये रहते हो.…

शादी के ७ सालो में लगभग ९०% लोग जो घर आ के खाना खा के गए वो Ganeshian ही थे.… उनके साथ अत्तीत के उन सुनहरे लम्हो को  बांटने में जो दिव्य  आनंद  मिला  है वो कहीं और कहाँ ,? MBBS  के बाद अर्जित की  गई डिग्रियां और  कमाए गए नोट उसके कहीं आस-पास भी नहीं फटकते...

 ऐसा इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि  हम सब आज भी उसी  पुरानेपन  को अपने में समाये हुए है ,कोई चाहे जिस भी मुकाम पे हो,  इन होनी वाली मुलाकातों में  अपना वहीं पुराना ट्रेडमार्क कमीनापन और अपनापन प्रदर्शित  करता है  जोकि  उसकी खास पहचान रही है , वर्तमान की उपलधियां अत्तीत की उन UG वाली संग की गई कारगुजारियों पे कभी भी हावी नहीं हो पाती

जिन संबंधो में स्वार्थ नहीं होता वे चिरस्थाई होते है …

कानपूर वालो को समझने के लिए कोई "Rocket  Science" की आवश्यकता नहीं , बस आपको उन्ही की तरह फक्कड़  और उन्ही की तरह दबंग, उन्ही के तरह मस्त और  उन्ही की तरह मलंग बनना पड़ेगा जो हर किसी के बूते की बात नहीं...

गंगा मैया का पानी किस्मत वालो को ही पीने को मिलता है  और हम कनपुरिये तो उस में नहाये हुए है.…

तो इस भाग-दौड़ और रेलम-पेल वाली ज़िन्दगी में मिलते रहिये , मेलजोल बड़ाते  रहिये,जाम टकराते रहिये और हमारे घर आते रहिये.... आप लोग ही मेरे लिए बेस्ट tranquilliser & best anti hypertensive हो ...






Friday, 22 August 2014

हमारे इश्क़ की मियाद खत्म है
रकीबों को हमारी ये हालत पसंद है

अपने कहे से मुकर रहे है बार -बार
लगता है मेहबूब को सियासत पसंद है

न टूटेंगे ,न बिखेरेंगे तुझ से जुदा हो के हम
हमारी शख़्सियत में अभी  इतना दम है

बे रोक टोक जश्न मन रहा है  तेरे जाने का
हमारे मैकदे की रौनक से दुनियां दंग है


जब जन है तो मत भी होगा ,और अगर मत है,,, वो तो निसंदेह अलग-अलग होगा।।। उत्कृष्ट होगा , निकृष्ट होगा (खुरपेची वाला ), नहीं भी होगा , पर ये अलग-अलग अलगाव पैदा न करे कुछ पोस्ट और विचार पढ़ के मन व्यथित हो जाता है। । अच्छे को सराहिये बुरे की निंदा कीजिये  जमकर कीजिये बाल की खाल निकालिये उसके अंदर के बबाल का भी विश्लेषण कीजिये मगर तर्क के साथ.… कुतर्क के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं।।। ऐसा लिखिए के पढ़ने वाले को  kick मिले वही सलमान खान वाला।।।






अच्छे -बुरे का भेद एक व्यापक चर्चा का विषय है। देश , काल ,रीति और समाज के अनुसार ये परिभाषित होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। हमारी हिन्दू सनातन धर्म के परंपरा के अनुसार मांस- मदिरा का सेवन हमेशा से ही बुरा और निषेध माना गया है और इसके लिए किसी दिन या महीने के कोई विशेष छूट नहीं। समय के अनुसार लोगो की खान-पान की आदते बदली है और नई पीढ़ी तो हमेशा से ही प्रयोगात्मक रही है। स्वनिर्मित ये अल्पकालिक निषेध शायद उस अपराधबोध को कम करने में थोड़े बहुत सहायक होते है जो हमें इन वर्जित माने गए  कार्यो को करने के बाद  होता है … और भईया Liver भगवान ने एक ही दिया है उसे भी तो थोडा बहुत आराम चाहिए ना 
बात कानपुर के कॉलेज के दिनों की है.… sale से एक सफ़ेद अंगूरा का स्वेटर ले दीवाली पे पिताजी को भेंट किया। पिताजी ज्यादा brand conscious  न तो पहले थे न अब  है पर उस समय woolmark के निशान को देख बस इतना समझ गए कि यह गरम तो जरूर होगा (पहाड़ी आदमी को ऐसी ही चीजों की तलाश रहती है) …

काफी कहने और बढ़ते जाड़े में एक दिन वे उसे पहनकर विद्यालय चले गए। स्वेटर को देख साथी अध्यापकों (जो कि उनके स्वाभाव और आदतों से भली-भांति परिचित थे ) ने कहा.… प्रिंसिपल साहब ये कहाँ से  से ले आये? , आपने तो पक्का नहीं ख़रीदा होगा , बहुत महंगा है जरुर बेटे ने दिया होगा...

अगली छुट्टियों पे जब दोबारा घर पंहुचा तो देखा के  पिताजी ने वो स्वेटर ,वापस मोमजामे की पन्नी चढ़ा कर ,सहेज कर वापस डिब्बे में रख दिया है.… मेरे ऐसा पूछने पर वे बोले .... काफी कीमती है, इसलिए संभाल  के रखा है.… कभी-कभार विशेष मौको पे ही निकलता हूँ...

इस घटना के लगभग 13 वर्षो बाद , पिछले वर्ष जब में घर पहुँच एकाएक बड़ी ठण्ड पे जब मैंने उनसे स्वेटर माँग की  तो उन्होंने उसी को लाकर मेरे सामने रख के मुस्कुरा के बोले... ले तेरा ही लाया हुआ तुझको दे रहा हूँ

गजब की क्षमता है हम से एक सिर्फ एक पीढ़ी पहले के लोगों में चीजों को सहेज के रखने  और मितव्यता की जिसे हम अक्सर कंजूसी कह के हास-परिहास में उड़ा देते है.....

घर में लगे  सामान के अंबार बावजूद हर दिन कुछ न कुछ खरीदने की खुजलाहट की बीच कभी- कभी जरूर ये ख्याल आता है.… काश ईश्वर  हमें भी वो ही सलाहियत बख्श  देता …

वैसे अब भी वो स्वेटर मेरे पास है पर हालत काफी खस्ता है....